भगवत् कृपा हि केवलम् !

भगवत् कृपा हि केवलम् !

Sunday, 5 June 2016

आइए लहलहाएँ अपने हिस्से की हरियाली !

'सूरज की गर्मी से तपते हुए तन को मिल जाए तरुवर की छाया' सोचकर ही कितना आनंद और सुकून सा मिलता है। लेकिन यह कब संभव है जब जगह-जगह हरे-भरे वृक्ष लगे होंगे और वृक्ष लगाने वाला कोई तो होना चाहिए।

हमारे पूर्वजों ने वृक्ष लगाए होंगे तभी आज हमारे आसपास दिखाई दे रहे हैं और हमें छाया प्रदान कर रहे हैं। दोस्तो लगभग 20 वर्ष पहले तक हमारे घर के कमरों में आकर एक छोटी सी चिड़िया फुदका करती थी। आज वह मुझे शहर से लगभग 15-20 किलोमीटर दूर ग्रामीण क्षेत्रों में जाने पर दिखाई देती है।

और कुछ कॉलोनियों में रंगीन तरह की चिड़िया और पक्षी दिखाई दे जाते हैं। फिर सोचता हूँ यह अंतर क्यों? जी हाँ, ठीक सोचा आपने। यही अंतर! मेरे घर के आसपास केवल इक्के-दुक्के पेड़ बचे हैं जबकि उन कॉलोनियों में लगभग हर घर के सामने या आँगन में हरे-भरे पेड़ हैं। पेड़ नहीं होंगे तो ये पक्षी अपने घर आखिर कहाँ बनाएँगे?

आज सड़कें बनती हैं, ओवरब्रिज बनते हैं। उनके लिए पेड़ों को न काटा जाए। हमारी मंशा तो यह बिल्कुल भी नहीं है। आखिर काम पड़ने पर बढ़ते यातायात का बोझ सहन करने के लिए सड़कें चाहिए और ओवरब्रिज भी। हम विकास के विरोधी नहीं हैं। लेकिन इनके बदले में अन्य स्थानों पर ही सही नए वृक्षों को लगाया जाए। अब तो धीरे-धीरे जस-के-तस पेड़ों को उखाड़कर उन्हें अन्यत्र रोपने की तकनीक का इस्तेमाल भी हो रहा है।

साल-दर-साल बारिश का कम होना, भूजल स्तर कम होना और इसके विपरीत गर्मी की तपन बढ़ते जाना आदि चीजें सीधे-सीधे इसी पर्यावरण से जुड़ी हैं। जब इसके दृष्टिगोचर होते परिणामों के बाद तो हमें चेत ही जाना चाहिए कि यह पर्यावरण हमारे लिए जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी है। तो क्यों न सर्वप्रथम इसकी रक्षा की जाए और समय रहते ग्लोबल वारर्मिंग के दुष्प्रभावों से बचा जाए। कहा भी जाता है कि एक पेड़ लगाने से एक यज्ञ के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है। कम से कम एक पेड़ जरूर लगाएँ और इसकी देखभाल भी करें। कुछ वर्षों बाद यह बड़ा होगा देखकर दिल को सुकून देगा। हर साल या 2 साल में या 5 साल में भी 1-1 वृक्ष आपने लगाया तो मैं समझता हूँ प्रकृति भी इसका तहेदिल से जरूर श‍ुक्रिया अदा करेगी और आगे चलकर इससे निश्चित रूप से हम लाभान्वित होंगे। 

पिछले दिनों देश के समाचार-पत्रों ने मध्‍यप्रदेश के इंदौर शहर के ग्रीनबेल्ट के लिए जो जागरुकता दिखाई और प्रस्तावित गोल्फ मैदान का पुरजोर विरोध किया, काबिलेतारीफ है और इसके लिए लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ साधुवाद का हकदार है। इतनी आवाजें एक साथ उठेंगी तो विरोध करने वाला कोई बचेगा ही नहीं। आसमान में सुराख भी होगा, लेकिन आवश्यकता है एक पत्थर ईमानदारी के साथ उछालने की। तो आइए लहलहाएँ अपने हिस्से की हरियाली।

आप सभी को विश्व पर्यावरण दिवस की  अनेको अनेक शुभकामनायें !

Monday, 21 March 2016

फूल की तरह तू भी खुशबू बिखेर यहाँ.....

विश्व कविता दिवस के अवसर पर मै आप लोगो के साथ ये छोटी सी कविता साझा कर रहा हू जो मैंने अपने स्कूल के दिनों में वर्ष 1999 में लिखी थी ।

आया है तू ये जहा में तो कुछ तो कर नया
फूल की तरह तू भी खुशबू बिखेर यहाँ ..।।


एक बात जान ले तू है नही देवा..
करने पड़ेंगे हर करम चाहे हो सज़ा ।
इंसान है तू इंसान की रंगत को बढ़ा...
आया है तू ये जहा में तो कुछ तो कर नया
फूल की तरह तू भी खुशबू बिखेर यहाँ ..।।

मुश्किलें है बहुत पर कदम तो बढ़ा
रास्ते कटते नही बिन पाये सज़ा ।
मिल जाएगी मंजिल तुम्हे बढ़ तो जरा...
आया है तू ये जहा में तो कुछ तो कर नया
फूल की तरह तू भी खुशबू बिखेर यहाँ ..।।

आया है तू ये जहा में तो कुछ तो कर नया
फूल की तरह तू भी खुशबू बिखेर यहाँ ..।।

सभी मित्रो को "विश्व कविता दिवस" की अनेको अनेक शुभकामनायें !
आप सभी का स्नेह हमें सदैव मिलता रहे - अजय कुमार दूबे

Tuesday, 15 September 2015

हिंदी दिवस - विलाप का नहीं, संकल्प लेने का दिन !


राष्ट्रभाषा के रूप में खुद को साबित करने के लिए आज वस्तुतः हिंदी को किसी सरकारी मुहर की जरूरत नहीं है। उसके सहज और स्वाभाविक प्रसार ने उसे देश की राष्ट्रभाषा बना दिया है। वह अब सिर्फ संपर्क भाषा नहीं है, इन सबसे बढ़कर वह आज बाजार की भाषा है, लेकिन हर 14 सितंबर को हिंदी दिवस के अवसर पर होने वाले आयोजनों की भाषा पर गौर करें तो यूँ लगेगा जैसे हिंदी रसातल को जा रही है। यह शोक और विलाप का वातावरण दरअसल उन लोगों ने पैदा किया है, जो हिंदी की खाते तो हैं, पर उसकी शक्ति को नहीं पहचानते। इसीलिए राष्ट्रभाषा के उत्थान और विकास के लिए संकल्प लेने का दिन ‘सामूहिक विलाप’ का पर्व बन गया है। कर्म और जीवन में मीलों की दूरी रखने वाला यह विलापवादी वर्ग हिंदी की दयनीयता के ढोल तो खूब पीटता है, लेकिन अल्प समय में हुई हिंदी की प्रगति के शिखर उसे नहीं दिखते।

अंग्रेजी के वर्चस्ववाद को लेकर हिंदी भक्तों की चिंताएं कभी-कभी अतिरंजित रूप लेती दिखती हैं। वे एक ऐसी भाषा से हिंदी की तुलना कर अपना दुख बढ़ा लेते हैं, जो वस्तुतः विश्व की संपर्क भाषा बन चुकी है और ज्ञान-विज्ञान के विविध अनुशासनों पर उसमें लंबा और गंभीर कार्य हो चुकाहै। अंग्रेजी दरअसल एक प्रौढ़ हो चुकी भाषा है, जिसके पास आरंभ से ही राजसत्ताओं का संरक्षण ही नहीं रहा वरन ज्ञान-चिंतन, आविष्कारों तथा नई खोजों का मूल काम भी उसी भाषा में होता रहा। हिंदी एक किशोर भाषा है, जिसके पास उसका कोई ऐसा अतीत नहीं है, जो सत्ताओं के संरक्षण में फला-फूला हो। आज भी ज्ञान-अनुसंधान के काम प्रायः हिंदी में नहीं हो रहे हैं। उच्च शिक्षा का लगभग अध्ययन और अध्यापन अंग्रेजी में हो रहा है। दरअसल हिंदी की शक्ति यहां नहीं है, अंग्रेजी से उसकी तुलना इसलिए भी नहीं की जानी चाहिए क्योकि हिंदी एक ऐसे क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा है, जो विश्व मानचित्र पर अपने विस्तारवादी, उपनिवेशवादी चरित्र के लिए नहीं बल्कि सहिष्णुता के लिए जाना जाने वाला क्षेत्र है। फिर भी आज हिंदी, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आवादी द्वारा बोली जाने वाली भाषा है, क्या आप इस तथ्य पर गर्व नहीं कर सकते ? दरअसल अंग्रेजी के खिलाफ वातावरण बनाकर हमने अपने बहुत बड़े हिंदी क्षेत्र को ‘अज्ञानी’ बना दिया तो दक्षिण के कुछ क्षेत्र में हिन्दी विरोधी रूझानों को भी बल दिया । सच कहें तो नकारात्मक अभियान भाषा को शक्ति नहीं दे सकते। 

एक भाषा के रूप में अंग्रेजी को सीखने तथा राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को समान आदर देने, मातृभाषा के नाते मराठी, बंगला या पंजाबी का इस्तेमाल करने में कोई बुराई नहीं है। किंतु किसी भाषा को समाज में यदि प्रतिष्ठा पानी है तो वह नकारात्मक प्रयासों से नहीं पाई जा सकती । अंग्रेजी के विस्तारवाद को हमने साम्राज्यवादी ताकतों का षडयंत्र माना और प्रचारित किया। फलतः भावनात्मक रूप से सोचने-समझने वाला वर्ग अंग्रेजी से कटा और आज यह बात समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए गलत नजीर बन गई। यद्यपि अंग्रेजी मुठ्ठीभर सत्ताधीशों, नौकरशाहों और प्रभुवर्ग की भाषा है। वह उनकी शक्ति बन गई है। तो शक्ति को छीनने का एकमेव हथियार है उस भाषा पर अधिकार। यदि देश के तमाम गांवों, कस्बों, शहरों के लोग निज भाषा के पूर्वाग्रह से ग्रसित नही होते तो अंग्रेजी आज मुठ्ठी भर लोगों के ‘अकड़ और शासन’ की भाषा न होती। इस सिलसिले में भावनात्मक नारेबाजियों से परे हटकर ‘विश्व परिदृश्य’ में हो रही घटनाओं-बदलावों का संदर्भ देखकर ही कार्यक्रम बनाने चाहिए । यह बुनियादी बात हिंदी क्षेत्र के लोग नहीं समझ सके। आज यह सवाल महत्वपूर्ण है कि अंग्रेजी सीखकर हम साम्राज्यवादी, उपनिवेशवादी कुछ क्रों से जुझ सकेंगे या उससे अनभिज्ञ रहकर। अपनी भाषा का अभिमान इसमें कहीं आड़े नहीं आता। भारतेंदु जी की यह बात-‘निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल’ आज के संदर्भ में भी अपनी प्रासंगिकता रखती है। आप इसी भाषा प्रेम के रुझानों को समझने के लिए दक्षिण भारत के राज्यों पर नजर डालें तो चित्र ज्यादा समझ में आएगा। मैं नहीं समझता कि किसी मलयाली भाषी, तमिल भाषी का अपनी मातृभाषा के प्रति प्रेम किसी बिहार, उ.प्र. या म.प्र.के हिंदी भाषी से कम है लेकिन दक्षिण के राज्यों ने अपनी भाषा के प्रति अनुराग को बनाए रखते हुए अंग्रेजी का भी ज्ञानार्जन किया, हिंदी भी सीखी। यदि वे निज भाषाका आग्रह लेकर बैठ जाते तो शायद वे आज सफलताओं के शिखर न छू रहे होते। आग्रहों से परे स्वस्थ चिंतन ही किसी समाज और उसकी भाषा को दुनिया में प्रतिष्ठा दिला सकता है। भाषा को अपनी शक्ति बनाने के बजाए उसे हमने अपनी कमजोरी बना डाला। बदलती दुनिया के मद्देनजर ‘विश्व ग्राम’ की परिकल्पना अब साकार हो उठी है। सो अंग्रेजी विश्व की संपर्क भाषा के रूप में और हिंदी भारत में संपर्क भाषा के स्थान पर प्रतिष्ठित हो चुकी है, यह चित्र बदला नहीं जा सकता।

हिंदी की ताकत दरअसल किसी भाषा से प्रतिद्वंद्विता से नहीं वरन उसकी उपयोगिता से ही तय होगी। आज हिंदी सिर्फ ‘वोट माँगने की भाषा’ है, फिल्मों की भाषा है। बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां में अभी आधारभूत कार्य होना शेष है। उसने खुद को एक लोकभाषा और जनभाषा के रूप में सिद्ध कर दिया है। किंतु ज्ञान-विज्ञान के विविध अनुशासनों पर उसमें काम होना बाकी है, इसके बावजूद हिंदी का अतीत खासा चमकदार रहा है। नवजागरण और स्वतंत्रता आंदोलन में स्वामी दयानंद से लेकर विवेकानंद तक लोगों को जगाने के अभियान की भाषा हिंदी ही बनी। गांधी ने भाषा की इस शक्ति को पहचाना और करोड़ों लोगों में राष्ट्रभक्ति का ज्वार पैदा किया तो उसका माध्यम हिंदी ही बनी थी। दयानंद ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ जैसा क्रांतिकारी ग्रंथ हिंदी में रचकर हिंदी को एक प्रतिष्ठा दी। जानकारी के लिए ये दोनों महानायक हिंदी भाषा नहीं थे। तिलक, गोखले, पटेल सबके मुख से निकलने वाली हिंदी ही देश में उठे जनज्वार का कारण बनी। यह वही दौर है जब आजादी की अलख जगाने के लिए ढेरों अखबार निकले। उनमें ज्यादातर की भाषा हिंदी थी। यह हिंदी के खड़े होने और संभलने का दौर था। यह वही दौर जब भारतेन्दु हरिचन्द्र ने ‘भारत दुर्दशा’ लिखकर हिंदी मानस झकझोरा था।उधर पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘आज’ के संपादक बाबूराव विष्णुराव पराड़कर, माधवराव सप्रे, मदनमोहन मालवीय, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी एक इतिहास रच रहे थे। मिशनरी पत्रकारिता का यह समय ही हमारी हिंदी पत्रकारिता की प्रेरणा और प्रस्थान बिंदु है।

आजादी के बाद भी वह परंपरा रुकी या ठहरी नहीं है। हिंदी को विद्यालयों विश्वविद्यालयों, कार्यालयों। संसद तथा अकादमियों में प्रतिष्ठा मिली है। तमाम पुरस्कार योजनाएं, संबर्धन के, प्रेरणा के सरकारी प्रयास शुरू हुए हैं। लेकिन इन सबके चलते हिंदी को बहुत लाभ हुआ है, सोचना बेमानी है। हिंदी की प्रगति के कुछ वाहक और मानक तलाशे जाएं तो इसे सबसे बड़ा विस्तार जहां आजादी के आंदोलन ने, साहित्य ने, पत्रकारिता ने दिलाया, वहीं हिंदी सिनेमा ने इसकी पहुँच बहुत बढ़ा दी। सिनेमा के चलते यह दूर-दराज तक जा पहुंची। दिलीप कुमार, राजकूमार, राजकपूर, देवानंद के ‘स्टारडम’ के बाद अभिताभ की दीवनगी इसका कारण बनी। हिंदी न जानने वाले लोग हिंदी सिनेमा के पर्दे से हिंदी के अभ्यासी बने। यह एक अलग प्रकार की हिंदी थी। फिर ट्रेनें, उन पर जाने वाली सवारियां, नौकरी की तलाश में हिंदी प्रदेशों क्षेत्रों में जाते लोग, गए तो अपनी भाषा, संस्कृति,परिवेश सब ले गए। तो कलकत्ता में ‘कलकतिया हिंदी’ विकसित हुई, मुंबई में ‘बम्बईयी हिंदी’ विकसित हुई। हिंदी ने अन्य क्षेत्रीय भाषाओं से तादात्म्य बैठाया, क्योंकि हिंदी के वाहक प्रायः वे लोग थे जो गरीब थे, वे अंग्रेजी बोल नहीं सकते थे। मालिक दूसरी भाषा का था, उन्हें इनसे काम लेना था। इसमें हिंदी के नए-नए रूप बने। हिंदी के लोकव्यापीकरण की यह यात्रा वैश्विक परिप्रक्ष्य में भी घट रही थी। पूर्वीं उ.प्र. के आजमगढ़, गोरखपुर से लेकर वाराणसी आदि तमाम जिलों से ‘गिरमिटिया मजदूरों’ के रूप में विदेश के मारीशस, त्रिनिदाद, वियतनाम, गुयाना, फिजी आदि द्वीपों में गई आबादी आज भी अपनी जडो़ से जुड़ी है और हिंदी बोलती है। सर शिवसागर रामगुलाम से लेकर नवीन रामगुलाम, वासुदेव पांडेय आदि तमाम लोग अपने देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी बने। बाद में शिवसागर रामगुलाम गोरखपुर भी आए। यह हिंदी यानी भाषा की ही ताकत थी जो एक देश में हिंदी बोलने वाले हमारे भारतीय बंधु हैं। इन अर्थों में हिंदी आज ‘विश्वभाषा’ बन चुकी है।


दुनिया के तमाम देशों में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन का काम हो रहा है।देश में साहित्य-सृजन की दृष्टि से, प्रकाश-उद्योग की दृष्टि से हिन्दी एक समर्थ भाषा बनी है। भाषा और ज्ञान के तमाम अनुशासनों पर हिन्दी में काम शुरु हुआ है। रक्षा, अनुवांशिकी, चिकित्सा, जीवविज्ञान, भौतिकी क्षेत्रों पर हिन्दी में भारी संख्या में किताबें आ रही हैं। उनकी गुणवक्ता पर विचार हो सकता है किंतु हर प्रकार के ज्ञान और सूचना को अभिव्यक्ति देने में अपनी सामर्थ्य का अहसास हिन्दी करा चुकी है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के बड़े-बड़े ‘अंग्रेजी दां चैनल’ भी हिन्दी में कार्यक्रम बनाने पर मजबूर हैं। ताजा उपभोक्तावाद की हवा के बावजूद हिन्दी की ताकत ज्यादा बढ़ी है। हिन्दी में विज्ञापन, विपणन उपभोक्ता वर्ग से हिन्दी की यह स्थिति ‘विलाप’ की नहीं ‘तैयारी’ की प्रेरणा बननी चाहिए। हिन्दी को 21वीं सदी की भाषा बनना है। आने वाले समय की चुनौतियों के मद्देनजर उसे ज्ञान, सूचनाओं और अनुसंधान की भाषा के रुप में स्वयं को साबित करना है। हिन्दी सत्ता-प्रतिष्ठानों के सहारे कभी नहीं फैली, उसकी विस्तार शक्ति स्वयं इस भाषा में ही निहित है। अंग्रेजी से उसकी तुलना करके कुढ़ना और दुखी होना बेमानी है। अंग्रेजी सालों से शासकवर्गों तथा ‘प्रभुवर्गों’ की भाषा रही है। उसे एक दिन में उसके सिंहासन से नहीं हटाया जा सकता।  हिन्दी का इस क्षेत्र में हस्तक्षेप सर्वथा नया है, इसलिए उसे एक लंबी और सुदीर्घ तैयारी के साथ विश्वभाषा के सिंहासन पर प्रतिष्ठित होने की प्रतीक्षा करनी चाहीए,अब तो देश की बागडोर भी एक हिंदी प्रेमी के हाथ में है ऐसे में हिंदी का भविष्य उज्जवल है  इसीलिए हिन्दी दिवस को विलाप, चिंताओं का दिन बनाने के बजाए हमें संकल्प का दिन बनाना होगा। यही संकल्प सही अर्थों में हिंदी को उसकी जगह दिलाएगा।

आप  क्या सोचते है ?? आपके विचार आमंत्रित है 

Saturday, 18 October 2014

पर्यावरण संरक्षण: प्रकृति की रक्षा करना भी हमारा ही धर्म है...

मित्रो पिछले कुछ समय से दुनिया में पर्यावरण के विनाश को लेकर काफी चर्चा हो रही है। मानव की गतिविधियों के कारण पृथ्वी के वायुमंडल पर जो विषैले असर पड़ रहे हैं , उनसे राजनेता , वैज्ञानिक , धर्मगुरु और सामाजिक कार्यकर्ता भी चिंतित हैं। एक आम इंसान को भी इसका अहसास होने लगा कि मनुष्य ने प्रकृति को हर दृष्टिकोण से नुकसान पहुंचाया है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई हो रही है , वाहनों से रोजाना हजारों - लाखों टन धुआं निकल रहा है जो हवा को प्रदूषित कर रहा है। कारखाने नदियों में जहरीला कचरा बहा रहे हैं तो कुछ बड़े राष्ट्र समुद्र में परमाणु परीक्षण करके उसे विषाक्त बना रहे हैं। मनुष्य के स्वार्थ का ही दुष्परिणाम है कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगा है। बढ़ते तापमान के कारण वातावरण पहले से अधिक गर्म हो गया है। इसके फलस्वरूप पहाड़ों पर जमी हुई बर्फ तेजी से पिघलने लगी है। पिघलती बर्फ का पानी समुद्र में पहुंचकर उसका जलस्तर बढ़ने लगा है। इसका नतीजा समुद्र के किनारे बसे शहरों को भुगतना पड़ रहा है। इनसे वहां रहने वाले हजारों - लाखों लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है। चूंकि प्रकृति मनुष्य की हर जरूरत को पूरा करती है , इसलिए यह जिम्मेदारी हरेक व्यक्ति की है कि वह प्रकृति की रक्षा के लिए अपनी ओर से भी कुछ प्रयास करे। पिछले कुछ वर्षों में विश्व पर्यावरण दिवस के मौको पर प्रकृति को बचाने के लिए कई समाधान भी सुझाए गए हैं। लेकिन ऐसे मौकों पर भी कोई ठोस काम करने का संकल्प लेने की बजाय घुमाफिरा कर एक ही बात को मुद्दा बनाने की कोशिश होती है कि आखिरकार पर्यावरण प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कौन है ? महात्मा गांधी ने सही कहा है कि प्रकृति हर आदमी की जरूरतों को पूरा कर सकती है , लेकिन किसी एक आदमी का लोभ पूरा नहीं कर सकती। 

आज हर आदमी प्रकृति का नाश करने पर ही तुला हुआ है। शायद वह यह नहीं जानता कि इस तरह खुद उसका अस्तित्व ही खत्म हो सकता है। लग रहा है कि लोगों को वैज्ञानिकों , नेताओं और समाजशास्त्रियों की बात समझ में नहीं आ रही है। ऐसे में इसका क्या उपाय हो सकता है कि लोग पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझें ? शायद यह काम भी धर्म के जरिए संभव हो सकता है। परंतु अहम सवाल यह है कि धर्म इसमें कैसे मदद कर सकता है ? यदि लोगों को समझाया जाए कि प्रकृति की सार - संभाल करना भी एक धार्मिक कार्य है तो शायद यह काम आसान हो जाए। लोगों को समझाना होगा कि चूंकि यह सृष्टि ईश्वर की रचना है , इसलिए उसका आदर - समान करना और उसकी रक्षा से संबंधित आज्ञाओं का पालन करना ही धर्म है। अच्छी बात यह है कि दुनिया के सभी धर्म ईश्वर और सृष्टि का आदर करना सिखाते हैं। सभी धर्मों में माना गया है कि प्रकृति की रक्षा करना ही मनुष्य की रक्षा करना है। प्रकृति की रक्षा करना ही हमारा धर्म है। मानव और प्रकृति के बीच सदियों से घनिष्ठ संबंध रहा है। वह ईश्वर को इस विश्व का सृष्टिकर्ता मानता है। अलग - अलग नामों से उस ईश्वर को संबोधित कर उसकी पूजा - अर्चना भी करता है। कहते हैं कि इस तरह इंसान अपने धर्म का पालन कर रहा है। लेकिन धर्म के पालन का अर्थ केवल परस्पर मानवीय व्यवहार करना , सदाचार और शिष्टाचार के नियमों का पालन करना ही नहीं है। इसका अर्थ तो ईश्वर और सृष्टि के साथ शिष्टाचार निभाना भी है। ईश्वर की आराधना तभी पूरी मानी जाएगी , जब उसके द्वारा रची गई सुंदर सृष्टि व उसमें विचरने वाले सभी प्रकार के जीव - जंतुओं की रक्षा की जाएगी और उनका आदर किया जाएगा। इस तरह पूरे पर्यावरण में शांति छा जाएगी। ऐसी स्थिति में सृष्टिकर्ता की मौजूदगी को महसूस किया जा सकेगा और परमात्मा को पाया जा सकेगा। हमारे आसपास का पर्यावरण जितना स्वच्छ होगा , तन - मन की शांति में उतना ही सहायक होगा। सृष्टि का आदर करना ईश्वर का आदर करना ही है।

मित्रो पिछले काफी दिनों से मैं कुछ व्यक्तिगत कारणों और अति- व्यस्तताओ के चलते कोई पोस्ट नहीं कर पाया ...पर अब पूरी कोशिश रहेगी की बीच बीच में आप लोगो से रूबरू होता रहू ..धन्यवाद

आप क्या सोचते है ? आपके विचार आमंत्रित है ..

Saturday, 19 May 2012

माँ को सुपर मॉम ....पर्फेक्ट मॉम....बनाने की कवादत.......??

हम लोगो ने हर दिन माँ को समर्पित करने वाले इस देश में "मदर्स डे " मनाना शुरू किया है बात फिर भी ठीक है पर आज कल की मिडिया , टीवी चैनलों और अपने आप को  ज्यादा आधुनिक समझने वाले लोगो ने कौन है परफेक्ट मॉम.... सुपर मॉम कोंटेक्सट... सरीखे प्रोग्राम बनाकर माँ के साथ क्या कर रहे है ?...उनका कैसा चित्रण कर रहे है ?....वो बताना क्या चाहते है....? दिखाना क्या चाहते है ...? लेकिन यह सुपर मॉम, पर्फेक्ट मॉम.. सरीखा फैशनेबल शब्द औरतों को कैसे नए तरह से गुलाम बना रहा है, ये वही समझ रही हैं।  

वह घर में होती है तो दफ्तर के छूटे हुए काम याद आते हैं। दफ्तर जाती है तो याद आता है कि बच्चे का होमवर्क ठीक से नहीं करा पाई। घर पहुंचते ही उसकी बाट जोहती वॉशिंग मशीन उम्मीद करती है कि स्विच ऑन किया जाए, बर्तनों से भरा सिंक और बिखरा पड़ा किचन दिन भर का उलाहना देता है और बच्चे-बूढ़े शाम के नाश्ते की फ़रमाइश करते मिलते हैं....। कहां से शुरू करे....।

हालत यह होती है कि नींद में भी वह कई बार जागती है और उसे काम के ही सपने आते हैं। एक समय के बाद तनाव, सिरदर्द, थकान इस सुपर मॉम की स्थायी समस्या हो जाती है। यह स्थिति बताती है कि वह अब सुपर मॉम सिंड्रोम से पूरी तरह ग्रस्त हो चुकी है। दबाव, तनाव, बेचैनी, अनिद्रा, अवसाद, निराशा, अकेलापन....ये कुछ लक्षण हैं इस सिंड्रोम के।

लेकिन क्या ये परेशानियां स्त्रियों के लिए संकेत हैं कि उन्हें बाहर नहीं निकलना चाहिए?, घर की जिम्मेदारियों को अच्छी तरह निभाना चाहिए? यह तो फिर से वापस लौटने की तरह होगा। आत्मनिर्भरता की जिस लड़ाई में ये इतना आगे तक बढ़ चुकी हैं क्या उन्हें फिर से पीछे जाना होगा? माना कि उन पर कई तरह के दबाव हैं, वे एक संक्रमण-काल से गुजर रही हैं, लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वे बाहर नहीं निकलना चाहतीं। उन्हें सिर्फ घर और कार्यस्थल का माहौल अपने अनुकूल चाहिए, जो अभी संभव नहीं हो पा रहा है। समस्या की जड़ यही है।

परिवारों का ढांचा परंपरागत है और बाहरी दुनिया में अभी उनकी कामकाजी छवि को लोग मन से स्वीकार नहीं पा रहे हैं। ख़ुद स्त्रियों को भी मानना होगा कि वे हर जगह पर्फेक्ट नहीं हो सकतीं। अगर बच्चों को मनचाहा समय नहीं दे पा रही हैं तो इसमें ग्लानि क्यों? जितना भी समय दे रही हैं-उसे भरपूर देने की कोशिश तो कर रही हैं। पर्फेक्ट कुक नहीं हैं तो क्यों अपने हाथों को लानत भेजें, दफ्तर में तो कुछ अच्छे प्रोजेक्ट्स तैयार कर रही हैं।

इस सिंड्रोम से बचने का एक ही रास्ता है-थोड़ा सा समय। यह थोड़ा सा समय जिसमें स्त्री ख़ुद के लिए कुछ करे। ख़ुद को अच्छा लगने के लिए कुछ करे। डांस करे, गुनगुनाए, एक्सर्साइज़ करे, वॉक करे, पेंटिंग करे....। हर काम के लिए समय निकाल रहे हैं तो थोड़े से पल अपने लिए निकालने में कंजूसी या अपराधबोध क्यों हो?

सबसे बड़ी चीज है प्राथमिकता तय करना, बच्चे छोटे हैं तो घर के कोने-कोने की सफाई से ज्यादा जरूरी है बच्चों को समय देना। स्वास्थ्य खराब है तो भी दूसरों की सेवा-टहल करते रहने के बजाय खुद को डॉक्टर को दिखाना ज्यादा जरूरी होना चाहिए। बच्चे को हर सुविधा देना क्यों जरूरी है? उनके खराब मार्क्स आने या घरेलू अव्यवस्थाओं के लिए वे खुद को ही दोषी क्यों समझें? किसी भी स्त्री के लिए यह याद रखना जरूरी है कि वह पत्नी, बहू या मां होने से पहले एक इंसान हैं और उसे भी एक इंसान की तरह जीने का हक भी है। खुद को मशीन न मानें। खुद को दूसरे की नजर में अच्छा बनाने से पहले अपनी नजर में अच्छी बनें। हर काम में पर्फेक्ट होना इतना भी जरूरी नहीं कि उसके लिए जिंदगी दांव पर लगा दी जाए।
ये सारे काम किए जा सकते हैं लेकिन ये सारे काम एक साथ नहीं किए जा सकते। स्त्री किसी परिवार का दिल है और इस दिल को हमेशा धड़कते रहने के लिए उसका सिर्फ मां होना काफी है, उसे सुपर मॉम या पर्फेक्ट मॉम बनने की कोशिश करने की जरूरत नहीं। 

आप क्या कहते है ?? आपके विचार आमंत्रित है -- अजय

Tuesday, 17 April 2012

धर्मं-चर्चा : चालीसा रहस्य .....!

श्रीराम के परम भक्त हनुमानजी हमेशा से ही सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देवताओं में से एक हैं। शास्त्रों के अनुसार माता सीता के वरदान के प्रभाव से बजरंग बली को अमर बताया गया है। ऐसा माना जाता है आज भी जहां रामचरित मानस या रामायण या सुंदरकांड का पाठ पूरी श्रद्धा एवं भक्ति से किया जाता है वहां हनुमानजी अवश्य प्रकट होते हैं। इन्हें प्रसन्न करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु हनुमान चालीसा का पाठ भी करते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि हनुमान चालीसा में चालीस ही दोहे क्यों हैं?

 
केवल हनुमान चालीसा ही नहीं सभी देवी-देवताओं की प्रमुख स्तुतियों में
चालीस ही दोहे होते हैं? विद्वानों के अनुसार चालीसा यानि चालीस, संख्या चालीस, हमारे देवी-देवीताओं की स्तुतियों में चालीस स्तुतियां ही सम्मिलित की जाती है। जैसे श्री हनुमान चालीसा, दुर्गा चालीसा, शिव चालीसा आदि। इन स्तुतियों में चालीस दोहे ही क्यों होती है? इसका धार्मिक दृष्टिकोण है। इन चालीस स्तुतियों में संबंधित देवता के चरित्र, शक्ति, कार्य एवं महिमा का वर्णन होता है। चालीस चौपाइयां हमारे जीवन की संपूर्णता का प्रतीक हैं, इनकी संख्या चालीस इसलिए निर्धारित की गई है क्योंकि मनुष्य जीवन 24 तत्वों से निर्मित है और संपूर्ण जीवनकाल में इसके लिए कुल 16 संस्कार निर्धारित किए गए हैं। इन दोनों का योग 40 होता है। इन 24 तत्वों में 5 ज्ञानेंद्रिय, 5 कर्मेंद्रिय, 5 महाभूत, 5 तन्मात्रा, 4 अन्त:करण शामिल है। 

सोलह संस्कार इस प्रकार है- 



1. गर्भाधान संस्कार


2. पुंसवन संस्कार


3. सीमन्तोन्नयन संस्कार


4. जातकर्म संस्कार
 

5. नामकरण संस्कार



6. निष्क्रमण संस्कार


7. अन्नप्राशन संस्कार


8. चूड़ाकर्म संस्कार


9. विद्यारम्भ संस्कार


10. कर्णवेध संस्कार
 

11. यज्ञोपवीत संस्कार


12. वेदारम्भ संस्कार


13. केशान्त संस्कार


14. समावर्तन संस्कार


15. पाणिग्रहण संस्कार


16. अन्त्येष्टि संस्कार


भगवान की इन स्तुतियों में हम उनसे इन तत्वों और संस्कारों का बखान तो करते ही हैं, साथ ही चालीसा स्तुति से जीवन में हुए दोषों की क्षमायाचना भी करते हैं। इन चालीस चौपाइयों में सोलह संस्कार एवं 24 तत्वों का भी समावेश होता है। जिसकी वजह से जीवन की उत्पत्ति है। 

  

Saturday, 3 March 2012

संस्कृति में है : ....भारत की एकता का आधार

आज संपूर्ण विश्व एक संक्रमण काल से गुजर रहा है। कहा जा रहा है कि बदलते समीकरणों के अनुसार 21 वीं सदी भारत और चीन की सदी होगी। एक अनुमान के अनुसार भारत आज विश्व की उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति ही नहीं है , बल्कि 21 वीं शताब्दी के मध्य तक भारत की जनसंख्या चीन से अधिक और इसका जीडीपी अमेरिका से अधिक हो जाएगा। यानी भारत का भविष्य अत्यंत संभावनापूर्ण है। परंतु इसका मुख्य आधार भारत के विशाल आकार और जनसंख्या में निहित है। एक अन्य बिंदु यह है कि भारत विश्व की सभी प्राचीनतम सभ्यताओं में से एकमात्र जीवित सभ्यता है। भारत विश्व का एकमात्र जीवित प्रागैतिहासिक राष्ट्र है। अतीत से भविष्य तक इतने लंबे अंतराल में इतने विराट स्वरूप को भारत कैसे संरक्षित करके रख सका , यह पश्चिमी विचारकों के लिए आश्चर्य और शोध का विषय है। 
नानो - मिस्र - रोमां
भारत की एकता का मुख्य आधार आर्थिक , राजनैतिक , प्रशासनिक कारणों में निहित नही था क्योंकि इन पर गठित बड़े - बड़े राष्ट्रों का जीवन बहुत लंबा नहीं होता। इतिहास में अरब क्षेत्र में टर्की और
मेसोपोटामिया  के साम्राज्य , उत्तरी अफ्रीका में मिस्र का साम्राज्य और यूरोप में रोमन साम्राज्य आज उसी क्षेत्र अनेक राष्ट्रों में विभाजित है। पिछली शताब्दी में ही चेकोस्लोवाकिया और सोवियत संघ का विघटन इसका उदाहरण है। भारत में एकता का सूत्र यहां की संस्कृति , धर्म और सांस्कृतिक मनोविज्ञान में इतने ढंग से बसा हुआ है कि सामान्य तौर पर वह नजर ही नहीं आता। 
शैव - शाक्त - वैष्णव
भारतीय संस्कृति की यह एक अद्भुत विशेषता है कि आप यहां के धर्म और संस्कृति के किसी भी प्रतीक पर रखिए तो संपूर्ण भारतवर्ष से स्वत : जुड़ जाएंगे। इसे कुछ उदाहरणों के द्वारा समझा जा सकता है। .... जैसे कोई भारतीय कहे कि वह वैष्णव है , उसकी आस्था भगवान राम में है तो उत्तर में अयोध्या से लेकर होते हुए धुर दक्षिण में रामेश्वरम तक सभी स्थानों से उस व्यक्ति की आस्था स्वयं जुड़ जाएगी। यदि व्यक्ति कहे कि उसकी आस्था भगवान श्रीकृष्ण में है तो उत्तर में उनकी जन्मभूमि मथुरा , पूर्व में
जगन्नाथपुरी , पश्चिम में द्वारिका और दक्षिण में तिरुपति बालाजी तक देश के सभी स्थानों से उसकी आस्था स्वत: जुड़ जाएगी। 

यदि कोई यह कहे कि वह वैष्णव नही बल्कि शैव है और उसकी आस्था भगवान शंकर में है तो उत्तर में
अमरनाथ, मध्य में उज्जैन के महाकाल , पश्चिम में सोमनाथ और दक्षिण में रामेश्वरम सहित द्वादश ज्योतिर्लिंगों के द्वारा भारत के हर कोने से उसकी आस्था जुड़ जाएगी। यदि कोई यह कहे कि वह शाक्त है और आस्था देवी में है तो उत्तर में वैष्णो देवी , मध्य में विंध्यवासिनी , पश्चिमी में मुंबा देवी , पूर्व में कामाख्या दक्षिण में कन्याकुमारी सहित देश के सभी भौगोलिक क्षेत्रों से उस व्यक्ति की आस्था अपने आप जुड़  जाएगी।

एकता का यह सूत्र सिर्फ विचार में नहीं था। इसका क्रियात्मक स्वरूप भी अनादिकाल से दिख रहा है। देश के चार स्थानों नासिक , उज्जैन , प्रयाग और हरिद्वार में हर तीन वर्ष के बाद कुंभ मेला होता है  और देश के समस्त साधु - संत और अखाड़े लगातार इन चारों स्थानों की यात्रा करते रहते हैं।  आदि शंकराचार्य जी ने चारों कोनों पर चार मठ बनाए और वहां के शंकराचार्य बनने के लिए यह बाध्यता बनाई कि उसी क्षेत्र का व्यक्ति शंकराचार्य नहीं बनेगा। अभी नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर विवाद के समय यह बात प्रकाश में आई कि वहां का मुख्य पुजारी शताब्दियों से कर्नाटक का ही होता रहा है। अर्थात राजनीतिक पार्थक्य भी एकता को सांस्कृतिक सूत्र से जोड़े रखता है।    

 
इतना ही नहीं , भारत में धर्म और संस्कृति के कर्मकांडों में भी , जिसकी आधुनिक बुद्धिजीवी तीव्र आलोचना
करते हैं , राष्ट्रीय एकता के गहरे सूत्र है। पूजा करते समय जब पुरोहित आपसे हाथ में जल लेने को कहता है तो संकल्प स्वरूप यह मंत्र बोला जाता है - ' गंगे यमुने गोदावरी , सरस्वती , नर्मदा , सिंधु , कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु ' अर्थात पूजा स्थल पर बैठे हुए आप भावना से देश की समस्त नदियों के साथ जुड़  जाते है। सांस्कृतिक विधान तो यह है कि त्यौहारों में स्नान करते समय भी यही मंत्र बोलना चाहिए।
  
 
स्पष्ट है कि भारत की एकता के सूत्र जिन देवी - देवताओं और परंपराओं में निहित हैं , उनके कारण देश का
कोई हिस्सा यदि किसी अन्य के प्रभाव में हो तो भी दूसरे हिस्से में बैठे व्यक्ति की भावना उस हिस्से से जुड़ी रहती है। भारतीय संस्कृति में जरूरी नहीं कि आप पूजा बाहर जाकर करें। आप अपने देवता घर में ही रख सकते हैं और घर बैठे किसी भी देवता की आराधना से आपकी आस्था सारे भारत के साथ जुड़ जाती है। यहां तक कि आप धार्मिक विधान के अनुसार स्नान करते हुए भी स्वयं को सारे भारत की नदियों से जुड़ा हुआ महसूस कर सकते हैं।   

चिरंतन और सनातन
विश्व की कोई भी सत्ता मंदिरों , मठों और आस्था के केंद्रों को तो नष्ट कर सकती है परंतु एक - एक व्यक्ति के घर
में घुसकर उसके क्रियाकलापों को नियंत्रित नहीं कर सकती। और स्नानागार में स्नान कर रहे व्यक्ति को नियंत्रित करना तो अकल्पनीय है। भारत की एकता के सूत्र सांस्कृतिक आस्था और धार्मिक कर्मकांड से लेकर के स्नानागार तक इतने सूक्ष्म तरीके से बिछे हुए हैं कि शताब्दियों के विदेशी शासन के बाद भी भारत अपनी राजनैतिक एकता को अक्षुण्ण रखकर विराट स्वरूप के साथ 21 वीं सदी में विश्व का मार्गदर्शन करने को तैयार खड़ा है , जबकि विश्व की अन्य महानतम शक्तियां अपनी किसी भी किस्म की एकता को नहीं बचा पाईं। इसीलिए भारत एक चिरंतन राष्ट्र है , सनातन राष्ट्र है।

भारत की युवा पीढ़ी को इसकी शक्ति के इस वास्तविक , मूल और नैसर्गिक तत्व को समझना होगा , इसे
संरक्षित और विकसित करना होगा। तभी भारत 21 वीं सदी में विश्व का नेतृत्व कर पाएगा।  

आप क्या कहते है ?? आपके विचार आमंत्रित है - अजय