भगवत् कृपा हि केवलम् !

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Thursday, 1 December 2011

रुपये का अवमूल्यन- बेहद खतरनाक ...!!

" रिजर्व बैंक की तरफ से हस्तक्षेप के बावजूद रुपये की गिरावट को रोका नहीं जा सका है। कह सकते हैं कि सरकार ने भी एक तरह से स्वीकार कर लिया है कि इस पर पूरी तरह काबू पाना उसके वश में नहीं है, जोकि एक खतरनाक स्थिति होगी "

डॉलर के मुकाबले रुपये का लगातार अवमूल्यन यूपीए सरकार की नाकामयाबियों को ही उजागर करता है। हालांकि वह इसके लिए वैश्विक मंदी को जिम्मेदार बता रही है। महंगाई और बढ़ती ब्याज दरों के बीच रुपये की कमजोरी घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े संकट के तौर पर उभरा है। रुपये में गिरावट से निर्यातकों को फायदा हुआ है, लेकिन आयात पर नकारात्मक असर पड़ने से वित्तीय बोझ बढ़ा है। सकल निर्यात के मुकाबले हमारा आयात लगभग दोगुना है इसलिए रुपये में गिरावट से विदेश व्यापार का कुल घाटा भी और अधिक बढ़ जाएगा। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के अनुसार वैश्विक वजहों से रुपये में गिरावट आ रही है और रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप से कोई मदद मिलने की फिलहाल कोई उम्मीद नहीं है।  

रिजर्व बैंक के गवर्नर डी. सुब्बाराव के अनुसार पिछले कुछ दिनों में विनिमय दर में जो उतार-चढ़ाव आया है वह वैश्विक घटनाक्रम की वजह से हुआ है और नीति यही है कि यदि विनिमय दर में उतार-चढ़ाव से आर्थिक हालात प्रभावित होते हैं तो हस्तक्षेप किया जाए, लेकिन अभी तक इस बारे में कोई भी निर्णय नहीं किया गया है। रुपया किस हद तक गिरेगा और किस दिशा में जाएगा यह सब विशेष तौर पर यूरोपीय कर्ज संकट के समाधान पर निर्भर करेगा। फिलहाल आरबीआइ ने रुपये को थामने के लिए हस्तक्षेप की कोई समयसीमा नहीं तय की है। आरबीआइ बाजार पर नजर रख रहा है और जरूरत पड़ने पर इस दिशा में आगे बढ़ सकता है। अमेरिका में कर्ज समाधान पर सहमति नहीं बन पाने के कारण भी बाजार में उथल-पुथल देखी जा रही है और शेयर बाजार को भारी झटका लगा है।

रुपये की कीमत में रिकॉर्ड गिरावट अर्थव्यवस्था की पहले से ही सुस्त पड़ती रफ्तार को और मंद कर सकती है। रुपया डॉलर के मुकाबले पिछले 33 महीनों के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। रिजर्व बैंक की तरफ से हस्तक्षेप के बावजूद रुपये की गिरावट को रोका नहीं जा सका है। कह सकते हैं कि सरकार ने भी एक तरह से स्वीकार कर लिया है कि इस पर पूरी तरह काबू पाना उसके वश में नहीं है। रुपये में और गिरावट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसा होने पर न सिर्फ आर्थिक विकास दर की रफ्तार और मंद पड़ेगी, बल्कि महंगाई रोकने की सरकार की तमाम कोशिशों पर भी पानी फिरेगा। वित्तीय मामलों के सचिव आर. गोपालन ने रुपये की गिरती कीमत को रोकने में सरकार की असमर्थता जताते हुए कहा कि रिजर्व बैंक एक सीमा तक ही रुपये की कीमत थाम सकता है। दरअसल, रुपया पिछले एक महीने से डॉलर के मुकाबले लगातार गिर रहा है। मगर सरकार अभी तक हस्तक्षेप नहीं कर रही थी। रिजर्व बैंक की तरफ से बहुत कम हस्तक्षेप हुआ, मगर बाजार का मूड देखकर केंद्रीय बैंक ने भी अपने कदम खींच लिए। ऐसे समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार के लक्षण नहीं दिख रहे और भारतीय शेयर बाजार से विदेशी संस्थागत निवेशकों के भागने का सिलसिला जारी है तो रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल खुलकर करने की स्थिति में नहीं है।   

एसोचैम के महासचिव डीएस रावत बताते हैं कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार इतना विशाल नहीं है कि रिजर्व बैंक रुपये के अवमूल्यन को रोकने के लिए बाजार में अधिक सक्रिय हो। निर्यात के जरिये मोटी कमाई करने वाली घरेलू दवा कंपनियों को रुपये में आई मौजूदा गिरावट के कारण तगड़ा नुकसान पहुंच रहा है। दरअसल, आयातित माल का लागत बढ़ने से यह स्थिति बनी है। इंडियन ड्रग मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन (आइडीएमए) के अनुसार आयात लागत में बढ़ोतरी से निर्यात पर मिलने वाला लाभ खत्म हो जाएगा। जहां तक निर्यात का सवाल है तो जोखिम से बचने के लिए पूर्व में किए गए सौदों की वजह से ज्यादातर कंपनियां लाभ नहीं उठा पाएंगी जिसका पूरे दवा उद्योग पर नकारात्मक असर होगा और उपभोक्ताओं को भी इससे नुकसान पहुंचेगा। 

रुपये की घटती कीमत ने उद्योग जगत की भी नींद उड़ा दी हैं। महंगे कर्ज से बचने के लिए विदेशी कर्ज जुटाना अब कंपनियों के गले की फांस बन गया है। घरेलू के मुकाबले अंतरराष्ट्रीय बाजार से सस्ता कर्ज उठाने वाली कंपनियों पर रुपये की कमजोरी भारी पड़ रही है। इस साल डॉलर के मुकाबले रुपये में हुई तेज गिरावट ने कंपनियों की देनदारी में भारी भरकम वृद्धि कर दी है। घरेलू बाजार में कर्ज की दरें 14-15 प्रतिशत तक पहुंचने के कारण इस साल जनवरी से अब तक कंपनियों ने विदेशी बाजारों से विदेशी वाणिज्यिक कर्ज (ईसीबी) के जरिये तककरीबन 1,50,000 करोड़ रुपये का कर्ज जुटाया है। विदेशी वाणिज्यिक कर्ज (ईसीबी) के जरिये कर्ज जुटाना कंपनियों को इसलिए भी आकर्षक लगा, क्योंकि उधारी की ब्याज दर जो पांच से सात प्रतिशत थी को चुकाना अपेक्षाकृत आसान था। कम ब्याज दरों पर कर्ज उठाने वाली कंपनियों का यह दांव रुपये के कमजोर होने से उलटा पड़ गया है। जनवरी से अब तक रुपये की कीमत में डॉलर के मुकाबले करीब 18 प्रतिशत तक की गिरावट आ चुकी है। जनवरी में एक डॉलर की कीमत 44 रुपये के आसपास थी जो अब 52.50 रुपये के आसपास  पहुँच गई है। 

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में तेज गिरावट, अर्थव्यवस्था के लिए बुरी खबर हो सकती है, लेकिन कुछ क्षेत्र इस गिरावट से फायदा भी उठा रहे हैं। प्रवासी भारतीयों और भारत में अपने परिवारों को धन भेजने वाले विदेश में रह रहे भारतीयों के लिए रुपये की गिरावट बेहद अच्छी खबर होती है। इसके अलावा विदेशी म्यूचुअल फंडों में निवेश करने वाले लोग और भारत में डॉलर जैसी विदेशी मुद्रा में आय अर्जित करने वाले प्रवासी भी फायदे में हैं विशेषज्ञों के अनुसार डॉलर का भाव 55 रुपये का स्तर भी छू सकता है, क्योंकि यूरो क्षेत्र के कर्ज संकट के कारण निवेशक डॉलर में निवेश को अधिक सुरक्षित मानकर ऊंचा दांव लगा रहे हैं। भारत में घूमने की योजना बना रहे लोगों के लिए भी रुपये में गिरावट फायदे का सौदा है। रुपये का इतना अधिक अवमूल्यन देश की अर्थव्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हो सकता है और इससे आने वाले समय में महंगाई और अधिक बढ़ेगी। 
आप सभी के विचार आमंत्रित है - अजय

Monday, 31 October 2011

प्रेम विवाह वक्त की जरूरत ...??

दो दशक पहले आधुनिकता की बयार से अछूते भारत के हालात वर्तमान परिदृश्य से पूरी तरह भिन्न थे. बदलती सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों ने पारिवारिक मान्यताओं को भी महत्वपूर्ण ढंग से परिवर्तित किया है. विशेषकर विवाह जैसी संस्था (जो भारतीय समाज में अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है) से जुड़े रीति-रिवाजों और परंपराओं में हम कई तरह के परिवर्तन देख सकते हैं. भारत के संदर्भ में विवाह का अर्थ है एक ऐसा संबंध जो ना सिर्फ पति-पत्नी को आपस में जोड़े रखे, बल्कि दो परिवारों को भी इस तरह एक सूत्र में पिरो कर रखे कि वे एक-दूसरे के सुख-दुख सांझा करने के लिए प्रेरित हों. इसीलिए हमारे बड़े-बुजुर्गों का यह मानना था कि जब विवाह के बाद दो परिवारों को आजीवन एक-दूसरे के साथ संबंध बनाए रखना हो तो जरूरी है कि दोनों में कुछ मूलभूत समानताएं हो, जैसे सामाजिक स्थिति और जाति. उस समय लड़के-लड़की को आपस में मिलने की अनुमति थी ही नहीं इसीलिए परिवार ही स्वयं अपनी समझ से उनके जीवन का यह सबसे बड़ा निर्णय कर लेता था.

लेकिन अब परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं. पहले जहां लड़कियों को लड़कों से मिलने तक की मनाही थी, वहीं आज वह उनके साथ स्कूल-कॉलेज में पढ़ती हैं और एक ही ऑफिस में काम करती हैं, जिसकी वजह से उनमें मेल-जोल की संभावना अत्याधिक बढ़ गई है. इस कारण उनमें भावनात्मक लगाव पैदा हो जाता है जो आगे चलकर प्रेम जैसे मनोभावों में विकसित हो जाता है. वह आपस में एक-दूसरे को जांचने-परखने के बाद विवाह करने का निर्णय कर लेते हैं. भले ही हमारे समाज के कुछ रुढ़िवादी लोग उनके इस कदम की भरपूर आलोचना करें, या उन पर कितने ही ताने कसें लेकिन बदलते समय के साथ-साथ प्रेम विवाह वर्तमान समय की जरूरत बन गया है.

पहले की अपेक्षा आज के युवा अधिक आत्मनिर्भर और शिक्षित हैं. वह अपनी आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को अपने अभिभावकों से ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं. आमतौर पर यह भी देखा जाता है कि भारत के युवाओं की मानसिकता परिवार के बाकी सदस्यों की अपेक्षा पूरी तरह आधुनिक हो चुकी है. इसीलिए वह विवाह संबंधी अपनी प्राथमिकताओं में कहीं भी समान जाति और धर्म को महत्व नहीं देते. वे अपने जीवन साथी के रूप में एक ऐसे दोस्त की तलाश करते हैं जिससे वह अपनी सभी बातें शेयर कर सकें और जो उनकी भावनाओं को समझने के साथ उनका सम्मान भी करे. आजकल जब महिला और पुरुष दोनों ही समान रूप से अपने कॅरियर के लिए सजग हैं तो वह यह भी अपेक्षा रखते हैं कि उनका जीवन साथी उनके काम और ऑफिस की परेशानियों को समझ उनके साथ सहयोग करेगा.

पहले जहां उनके माता-पिता अपनी परंपराओं की दुहाई देते हुए युवक-युवती से बिना पूछे और उन्हें एक-दूसरे को जानने का मौका दिए बगैर विवाह करने का आदेश दे देते थे, वहीं आज के युवा ऐसे जटिल रिवाजों को नहीं बल्कि परिपक्वता और व्यवहारिकता को महत्व देते हैं. इसीलिए वह अपनी कुछ मूलभूत अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए एक ऐसे व्यक्ति से विवाह करना चाहते हैं जिसे वह पहले से ही जानते और समझते हों और जिसके स्वभाव और आदतों से वह भली-भांति अवगत हों ताकि उनके वैवाहिक जीवन में एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान बरकरार रहे. वह अपनी प्रसन्नता और आपसी सहमति के साथ उसका निर्वाह करें ना कि उसे सिर्फ पारिवारिक और सामाजिक बंधन समझें.

परंपरागत विवाह में पति-पत्नी विवाह के बाद एक-दूसरे को समझना शुरू करते हैं और इसी दौरान अगर कहीं उन्हें ऐसा प्रतीत होने लगे कि जिस व्यक्ति से उन्होंने विवाह किया है, उसके साथ वह किसी भी प्रकार का तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं या उनके जीवन साथी की आदतें और स्वभाव उनके लिए सही नहीं हैं, तो ऐसे में उनके पास किसी तरह संबंध को बनाए रखने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रह जाता. वह स्वयं को सामाजिक बंधनों में जकड़ा हुआ पाते हैं. अपनी खुशियों और आकांक्षाओं को भूल वह जैसे-तैसे अपने संबंध का गुजारा कर रहे होते हैं.

इसके विपरीत प्रेम-विवाह में ऐसे हालातों की गुंजाइश बहुत कम हो जाती है क्योंकि विवाह करने वाले लोग एक-दूसरे को पहले से ही समझते हैं. एक-दूसरे के स्वभाव और आदतों को भी वह अच्छी तरह जानते हैं, ऐसे मे उनमें मनमुटाव पैदा होने की संभावना ना के बराबर रह जाती है. उन दोनों में औपचारिकता जैसी भावना भी पूरी तरह समाप्त हो जाती है जिसकी वजह से उनका वैवाहिक संबंध अपेक्षाकृत अधिक सहज और खुशहाल बन पड़ता है.

हालांकि प्रेम-विवाह में भी थोड़ी-बहुत मुश्किलें आती हैं क्योंकि विवाह के संबंध में बंधने के बाद स्वाभाविक तौर पर व्यक्तियों के उत्तरदायित्वों का दायरा बढ़ जाता है. प्रेमी जब पति-पत्नी बन जाते हैं तो उन पर एक-दूसरे की जिम्मेदारियों के अलावा परिवार की जिम्मेदारियां भी होती हैं, जो उन्हें अपनी प्राथमिकताओं को परिवर्तित करने के लिए विवश कर देती हैं. इसकी वजह से कई बार ऐसे हालात भी पैदा हो जाते हैं जिनके कारण एक-दूसरे से बेहद प्रेम करने वाले व्यक्तियों के बीच मतभेद या मनमुटाव पैदा हो जाते हैं. लेकिन इनका निपटारा करना भी ज्यादा मुश्किल नहीं होता क्योंकि वे दोनों अपेक्षाकृत अधिक परिपक्व और एक दूसरे से भावनात्मक रूप से काफी हद तक जुड़े होते हैं. एक-दूसरे की परेशानियों को समझ वह खुद को परिस्थिति के अनुरूप ढाल लेते हैं. लेकिन अगर परंपरागत विवाह में ऐसी परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं तो कई बार पति-पत्नी के बीच सुलह कराने के लिए परिवार को दखल देना पड़ता है.

हमारा समाज जो आज भी प्रेम-विवाह को गलत मानता है, उसे यह समझना होगा कि विवाह दो परिवारों की साख और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा से कहीं ज्यादा दो लोगों के व्यक्तिगत जीवन से संबंधित है. इसीलिए अगर परिवार के युवा परिपक्व और समझदार हैं, वह जानते हैं कि उनके लिए क्या सही रहेगा तो हमें केवल अपनी परंपराओं का हवाला देते हुए उनकी भावनाओं को आहत नहीं करना चाहिए. अब समय पहले जैसा नहीं रहा. आज के युवा स्वतंत्र और आत्मनिर्भर हैं. समय बदलने के साथ-साथ उनकी प्राथमिकताएं और जरूरतें भी परिवर्तित हुई हैं. इसीलिए उनकी खुशी और बेहतर भविष्य के लिए जरूरी है कि विवाह के लिए केवल परंपराओं और मान्यताओं को ही आधार ना बनाया जाए बल्कि अपनी मानसिकता का दायरा बढ़ा कर परिपक्वता और व्यवहारिकता को महत्व दिया जाए.

आप क्या सोचते है ? आपके विचार आमंत्रित है - अजय 

  

Monday, 5 September 2011

शिक्षा का बदलता स्वरुप........

आज शिक्षक दिवस है, मतलब शिक्षा और शिक्षकों के योगदान और महत्व को समझने का दिन। पर आज जब शिक्षा का पूरा तंत्र एक बड़े व्यवसाय में तब्दील हो रहा है, क्या हम शिक्षा और शिक्षक की गरिमा को बरकरार रख पाए हैं? वास्तव में पूंजीवादी विश्व के बदलते स्वरूप और परिवेश में हम शिक्षा के सही उद्देश्य को ही नहीं समझ पा रहे है। सही बात तो यह है कि शिक्षा का सवाल जितना मानव की मुक्ति से जुड़ा है उतना किसी अन्य विषय या विचार से नहीं। एक बार देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ब्रिटेन के एडिनबरा विश्र्वविद्यालय मे भाषण देते हुए कहा था कि शिक्षा और मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति है। पर जब मुक्ति का अर्थ ही बेमानी हो जाए, उसका लक्ष्य सर्वजन हिताय की परिधि से हटकर घोर वैयक्तिक दायरे में सिमट जाए तो मानव-मन स्व के निहितार्थ ही क्रियाशील हो उठता है और समाज में करुणा की जगह क्रूरता, सहयोग की जगह दुराव, प्रेम की जगह राग-द्वेष व प्रतियोगिता की भावना ले लेती है। इन दिनों जब शिक्षा की गुणात्मकता का तेजी से ह्रास  होता जा रहा है, समाज में सहिष्णुता की भावना लगातार कमजोर पड़ती जा रही है और गुरु-शिष्य संबंधों की पवित्रता को ग्रहण लगता जा रहा है। डॉ. राधाकृष्णन का पुण्य स्मरण फिर एक नई चेतना पैदा कर सकता है। वह शिक्षा में मानव के मुक्ति के पक्षधर थे। वह कहा करते थे कि मात्र जानकारियां देना शिक्षा नहीं है। करुणा, प्रेम और श्रेष्ठ परंपराओं का विकास भी शिक्षा के उद्देश्य हैं। शिक्षा की दिशा में हमारी सोच अब इतना व्यावसायिक और संकीर्ण हो गई है कि हम सिर्फ उसी शिक्षा की मूल्यवत्ता पर भरोसा करते हैं और महत्व देते हैं जो हमारे सुख-सुविधा का साधन जुटाने में हमारी मदद कर सके, बाकी चिंतन को हम ताक पर रखकर चलने लगे हैं। देश में बी.एड. महाविद्यालयों को खोलने को लेकर जिस तरह से राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद धड़ल्ले से स्वीकृति प्रदान कर रहा है, वह एक दुखद गाथा है। प्राय: सभी महाविद्यालय मापदंडों की अवहेलना करते हैं। महाविद्यालय धन कमाने की दुकान बन गए हैं और शिक्षा का अर्थ रह गया है है परीक्षा, अंक प्राप्ति, प्रतिस्पर्धा तथा व्यवसाय। देश में यही हालत तकनीकी शिक्षा की है जहां बिना किसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी के लगातार कॉलेज खुल रहे है। लोगों को यह एक अच्छा व्यवसाय नजर आने लगा है। पिछले दिनों इस पर योजना आयोग ने अपना ताजा दृष्टिकोण-पत्र जारी कर दिया है। आयोग चाहता है कि ऐसे उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना की अनुमति दे दी जानी चाहिए, जिनका उद्देश्य मुनाफा कमाना हो। दृष्टिकोण-पत्र के मुताबिक 1 अप्रैल, 2012 से शुरू हो रही 12वीं पंचवर्षीय योजना में उच्च शिक्षा, खासकर तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बड़ी भूमिका देने के लिए अनुकूल स्थितियां बनाने की जरूरत है। अभी इस दृष्टिकोण-पत्र पर सरकार की मुहर नहीं लगी है, इसके बावजूद यह सुझाव पिछले वर्षो के दौरान उच्च शिक्षा क्षेत्र के बारे में चली चर्चा के अनुरूप ही है। विदेशी विश्र्वविद्यालयों को भारत में अपनी शाखा खोलने की इजाजत के साथ भी यह बात जुड़ी हुई है कि वे सिर्फ मुनाफे की संभावना दिखने पर ही यहां आएंगे। आज आवश्यकता है देश में प्राचीन समृद्ध ज्ञान के साथ युक्तिसंगत आधुनिक ज्ञान आधारित शिक्षा व्यवस्था की। देशभक्ति, स्वास्थ्य-संरक्षण, सामाजिक संवदेनशीलता तथा अध्यात्म-यह शिक्षा के भव्य भवन के चार स्तंभ हैं। इन्हें राष्ट्रीय शिक्षा की नीति में स्थान देकर स्वायत्त शिक्षा को संवैधानिक स्वरूप प्रदान करना चाहिए। इन सब उपायों से शिक्षा की चुनौतियों का मुकाबला किया जा सकता है। शिक्षा बाजार नहीं अपितु मानव मन को तैयार करने का उदात्त सांचा है। जितनी जल्दी हम इस तथ्य को समझेंगे उतना ही शिक्षा का भला होगा। तभी हम शिक्षक दिवस को सच्चे अर्थो में सार्थक कर सकेंगे और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अधूरे सपनों को पूरा कर पाएंगे।

आप सभी को शिक्षक दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें !!

आपके विचार आमंत्रित है - अजय

Saturday, 2 July 2011

कांग्रेस - बीजेपी के बीच फर्क ........??

" कांग्रेस में कोई नितिन गडकरी भी हो सकता है, इसमें मुझे संदेह है। मनमोहन सिंह को मैं अपवाद मानता हूं। मैं तब कांग्रेस को दाद दूंगा, जब राहुल के होते हुए पार्टी अगले चुनाव में किसी और नेता को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करे..."

यह सवाल हमेशा ही उठता है कि कांग्रेस और बीजेपी में बेहतर कौन है?? जवाब देना हमेशा ही मुश्किल होता है। कांग्रेस आजादी की लड़ाई से निकली पार्टी है। आजादी के बाद राष्ट्र के निर्माण में उसकी भूमिका है। जवाहरलाल नेहरू की सेकुलर-डेमोक्रेटिक-पॉलिटिक्स ने इस देश को पाकिस्तान बनने से बचा लिया। बीजेपी यह दावा नहीं कर सकती। आजादी की लड़ाई के समय तो बीजेपी थी ही नहीं। आरएसएस था। गांधीजी की हत्या के बाद लगे प्रतिबंध से आरएसएस को राजनीतिक दल का महत्व समझ में आया और जनसंघ का उदय हुआ। श्यामा प्रसाद मुखर्जी और उनके बाद दीन दयाल उपाध्याय ने पार्टी की बागडोर संभाली। हिंदूवाद में लिपटा उग्र-राष्ट्रवाद जनसंघ की पहचान बना। कैडर आधारित पार्टी होने के बाद भी उसका जनाधार सीमित था। इमरजेंसी ने जनसंघ को देश की राजनीति के केंद्र में लाने में मदद की। लेकिन बीजेपी का असल उभार दिखा अयोध्या आंदोलन के समय। बोफोर्स की मार, मंडल और मंदिर पर साफ स्टैंड न लेने की विवशता और लचर नेतृत्व ने कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से दूर कर दिया और बीजेपी पहली बार केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब हुई। इसके बाद से ही देश में दो ध्रुवीय राजनीति की शुरु आत हुई। एक ध्रुव की अगुवाई कांग्रेस के पास और दूसरे की बीजेपी के हवाले। लेकिन नई आर्थिक नीति ने दोनों प्रमुख पार्टियों के बीच की वैचारिक दूरी को काफी कम कर दिया है। आज बीजेपी और कांग्रेस में कोई खास फर्क नहीं दिखता। न उनके नेताओं के आचरण में और न ही पॉलिसी के स्तर पर। वरना एक जमाना था, कांग्रेस समाजवाद का डंका पीटा करती थी और निर्गुट आंदोलन की अगुवा होने के बावजूद वह सोवियत संघ के काफी नजदीक थी। जनसंघ या बीजेपी को तब आर्थिक रूप से खुले बाजारवाद का समर्थक बताया जाता था और वह अमेरिका से करीबी संबंध की वकालत करती थी। समाजवाद के खात्मे के साथ ही कांग्रेस भी आर्थिक उदारवाद की गोद में बैठ गई। मनमोहन सिंह के सौजन्य से देश में बाजारवाद की बयार बहने लगी। आरएसएस के तमाम स्वदेशी आंदोलन के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी के छह साल के शासन में देश उदारीकरण के रास्ते से जरा भी नहीं भटका। कभी-कभी तो यह लगता था कि कांग्रेस भी अगर 1998 से 2004 तक केंद्र में रहती, तो आर्थिक नीतियों में कोई नई चीज नहीं देखने को मिलती।

कांग्रेस-बीजेपी के बीच आम आदमी...........

गौर से देखा जाए, तो सेकुलरिज्म के अलावा सिर्फ एक अंतर दोनों में नजर आता है। बीजेपी कांग्रेस की तुलना में ज्यादा लोकतांत्रिक पार्टी दिखती है। नेहरू-गांधी की विरासत की वजह से कांग्रेस में जिस तरह का अंदरूनी लोकतंत्र होना चाहिए, उसमें इसकी कमी साफ झलकती है। आजादी के 63 साल बाद भी पार्टी नेहरू-गांधी की मोहताज है। सोनिया गांधी ने पार्टी की बागडोर नहीं संभाली होती, तो शायद कांग्रेस का आज कोई नामलेवा भी नहीं होता। नरसिंह राव और सीताराम केसरी ने पार्टी का कबाड़ा ही कर दिया था और पार्टी इस हद तक कमजोर हुई कि आज तक केंद्र में अकेले अपने बल पर सरकार बनाने की नहीं सोच सकती। सोनिया पर निर्भरता ने पार्टी की केंद्र में वापसी में मदद तो की, लेकिन उसे हमेशा के लिए पंगु भी कर दिया। तमाम बड़े नेताओं के बाद भी पार्टी राहुल गांधी में अपना अगला नेता और प्रधानमंत्री देखने के लिए अभिशप्त है। पार्टी में आंतरिक चुनाव पूरी तरह से समाप्त हो गए हैं। एक वक्त था, जब कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्य खुले चुनाव के जरिए चुनकर आते थे, आज यह परंपरा खत्म हो गई है। कार्यकारिणी के लिए नेता इलेक्ट नहीं, सेलेक्ट होते हैं। मुख्यमंत्री का चुनाव विधायक नहीं, आलाकमान करता है। बीजेपी इस मामले में अभी तक अपने को खुशनसीब मान सकती है। पार्टी एक परिवार के सहारे नहीं है। वहां कोई भी आम कार्यकर्ता पार्टी का अध्यक्ष बनने का ख्वाब पाल सकता है और देश का प्रधानमंत्री भी बन सकता है। उसके यहां किसी एक नेता का आदेश नहीं चलता। वरिष्ठ नेता मिल-बैठकर फैसले करते हैं। लालकृष्ण आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता को भी, भले ही आरएसएस के दबाव में ही सही, पार्टी अध्यक्ष और नेता विपक्ष का पद छोड़ना पड़ता है। पार्टी में पले-बढ़े अरुण जेटली और सुषमा स्वराज जैसे लोग प्रधानमंत्री बनने का सपना देख सकते हैं। इसके लिए उन्हें अपनी काबिलियत साबित करनी होगी। राहुल गांधी की तरह परिवार में जन्म लेना वहां एक मात्र योग्यता नहीं है। मैं यह कहने की गुस्ताखी कर सकता हूं कि कांग्रेस में कोई नितिन गडकरी भी हो सकता है, इसमें मुझे संदेह है। मनमोहन सिंह को मैं अपवाद मानता हूं। मैं तब कांग्रेस को दाद दूंगा, जब राहुल के होते हुए पार्टी अगले चुनाव में किसी और नेता को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करे। कहने वाले यह कह सकते हैं कि बीजेपी में आरएसएस के इशारे के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता। लेकिन आरएसएस अपनी तमाम खामियों के बावजूद पार्टी के रोजमर्रा के काम में दखल नहीं देता जबकि कांग्रेस में रोजमर्रा के फैसले भी नेहरू-गांधी परिवार के इशारे के बगैर नहीं हो सकते।

आपके विचार आमंत्रित है -- अजय 

Saturday, 4 June 2011

बाबा रामदेव जी का सत्याग्रह ! भारत के पुनरुत्थान का शंखनाद ........

मित्रो आज से योगगुरु बाबा रामदेव जी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में अनिश्चितकालीन आमरण अनशन 'सत्याग्रह' शुरू करके भारत के पुनरुत्थान (नवनिर्माण) का शंखनाद कर दिया है। हम बाबा जी के इस महान यज्ञ के सफलता के लिए परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करते है।
अभी कुछ दिन पहले ही अन्ना भाऊ ने निद्रा में लीन सरकार को झकझोरा था पर अन्ना के ही अनुसार 'सरकार ने उन्हे धोखा ही दिया है अबतक और सरकार का एक कमजोर लोकपाल बनाने का इरादा है' ठीक ही कहा गया है किसी को निद्रा से जगाना तो आसान है परन्तु जानबूझकर निद्रा का ढोंग करने वाले को कौन जगा सकता है। साथ ही अन्नाजी द्वारा भी कई मामलो में वेवजह की गयी बयानबाजी भी सरकार के पक्ष में रही, हालाँकि इसमे कोई शक नहीं की अन्ना भाऊ एक नेक और सच्चे देशभक्त इंसान है।
बाबा की ललकार!!योजनावद्ध तैयारी का परिणाम....
सफलता के लिए हिम्मत, योजना, लगन, सत्यनिष्ठा, अनुशासन, दृढ़ता और सजगता बहुत ही आवश्यक होता है, इन गुणों के बगैर कोई योगी कैसे हो सकता है ये सभी गुण अपने आप में योग ही तो है। बाबा जी तो है ही योगगुरु , रामदेव जी ने पिछले ५-६ वर्षो से अपने हर योग शिविर एवं सार्वजनिक मंचो से बहुत सारे ज्वलंत मुद्दे उठाते रहे साथ ही उस पे अपने मत भी रखने लगे, और पिछले २-३ वर्षो से तो इसके सार्थक समाधान के लिए भी आगे आते रहे है। बाबा ने २००९ में पहले भारत स्वाभिमान आन्दोलन की स्थापना किया और फिर भारत स्वाभिमान यात्रा के अंतर्गत पिछले वर्ष से सम्पूर्ण भारत की यात्रा पे निकले और जन जन में भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़े होने एवं ब्यवस्था परिवर्तन करने की जागृति ला रहे थे। इसी योजना के तहत बाबा ने ये घोषणा की थी कि २५ मई २०११ को सम्पूर्ण भारत कि यात्रा पूरी करने के बाद अगर जरुरत पड़ी तो (सरकार मांगो को नहीं मानेगी तो) महाराणा प्रताप के जन्मदिवस ४ जून २०११ से अनिश्चित काल के लिए सत्याग्रह करेंगे सच तो यह है कि उन्होंने ज्वलंत मुद्दों को सामने लाने का प्रयास किया है। यदि सरकार इस दिशा पर पहले ही ध्यान देती और उसकी नीयत साफ होती, तो यह नौबत ही नहीं आती। पर सरकार की नीयत में खोट है, निश्चित रूप से यह सोचने वाली बात है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे लोग सरकार को बता रहे हैं कि उसे क्या करना चाहिए। बाबा के शंखनाद ने सरकार के होश उड़ा दिए है, आजाद भारत में इस तरह के ज्यादा उदाहरण नहीं मिल पाएंगे कि किसी चुनी हुई सरकार ने किसी आंदोलनकारी नेता के समक्ष इस तरह सार्वजनिक रूप से शीर्षासन किया हो वो भी आन्दोलन शुरू होने से पहले ही 
नैतिक बल का पर्याय है, बाबा का हठयोग..... 
कानून व व्यवस्था में अमूलचूल बदलाव के लिए बाबा का हठयोग इसलिए दृढ़ संकल्प का पर्याय बन रहा है, क्योंकि उनके साथ नैतिकता और ईमानदारी का बल भी है। वैसे भी हठी और जिद्दी लोग ही कुछ नया करने और अपने लक्ष्य को हासिल करने की ताकत रखते हैं। बाबा को व्यापारी कहकर उनकी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम पर हमला बोला जा रहा है। लेकिन यहां गौरतलब है कि बाबा ने योग और आयुर्वेद दवाओं से पहले पैसा कमाया और वे यह धन देश की राजनीति और नौकरशाही का शुध्दीकरण कर उसे पुनर्जन्म देने की कोशिशों में लगा रहे हैं तो इसमें खोट कहां है ? हमारे विधायक, सांसद और मंत्री तो सत्ता हासिल करने के बाद भ्रष्ट आचरण से पैसा कमाते हैं और फिर लोक छवि बनी रहे यह प्रदर्शित करने के लिए व्यापार की ओट लेते हैं। ये काम भी ऐसे करते हैं जो गोरखधंधों और प्राकृतिक संपदा की अंधाधुंध लूट से जुड़े होते हैं। बाबा ईमानदारी से आय और विक्रयकर भी जमा करते हैं। यदि वे ऐसा नहीं कर रहे होते तो उन्हें अब तक आयकर के घेरे में ले लिया गया होता अथवा सीबीआई ने उनके गले में आर्थिक अपराध का फंदा डाल दिया होता। बाबा ने व्यापार करते हुए जनता से रिश्ता मजबूत किया, जबकि हमारे जनप्रतिनिधि निर्वाचित होने के बाद आम आदमी से दूरी बढ़ाने लगते हैं। इन्हीं कारणों के चलते बदलाव की आंधी जोर पकड़ रही है और देश की जनता अन्ना हजारे व बाबा रामदेव जैसे निश्चल व ईमानदार गैर राजनीतिक शख्सियतों में नायकत्व खोज उनकी ओर आकर्षित हो रही है।
अन्ना हजारे के बाद बाबा के अनशन से परेशान केंद्र सरकार के प्रकट हालातों ने तय कर दिया है कि देश मे नागरिक समाज की ताकत मजबूत हो रही है। इससे यह भी साबित होता है कि जनता का राजनीतिक नेतृत्वों से भरोसा उठता जा रहा है। विपक्षी नेतृत्व पर भी जनता को भरोसा नहीं है। अलबत्ता अन्ना और बाबा के भ्रष्टाचार से छुटकारे से जुड़े एसे आंदोलन ऐसे अवसर हैं, जिन्हें बिहार, ओडीसा, बंगाल और तमिलनाडू की सरकारें सामने आके अपना समर्थन दे सकती थीं। भ्रष्टाचार के मुद्देपर वामपंथ को भी इन ईमानदार पहलों का समर्थन करना चाहिए। लेकिन बंगाल की हार के बाद वे अपने जख्म ही सहलाने में लगे हैं। अन्य मठाधीश बाबाओं के भी करोड़ों चेले व भक्त हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इन्हें अपनी कुण्डली तोड़कर रामदेव और अण्णा के साथ आकर नागरिक समाज की ताकत मजबूत करने में अपना महत्तवपूर्ण योगदान देना चाहिए। 1964 में हजारों नगा साधुओं ने गोहत्या के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन छेड़ा था। दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और महार्षि अरबिन्द जैसे दिग्गज संतों ने भी आजादी की लड़ाई में अपनी पुनीत आहुतियां दी थीं। क्योंकि अन्ना और बाबा जिन मुद्दों के क्रियान्वयन के लिए लड़ रहें हैं, उनमें गैरबाजिव मुद्दा कोई नहीं है। इसलिए सामंतवादी और पूंजीवादी राजनीति की शक्ल बदलनी है तो यह एक ऐसा सुनहरा अवसर है जिसमें प्रत्येक राष्ट्रीय दायित्व के प्रति चिंतित व्यक्ति को अपना सक्रिय समर्थन देने की जरूरत है।  अन्ना की तरह बाबा रामदेव भी एक सक्षम लोकपाल चाहते हैं।अन्ना भाऊ की तो एकमात्र मांग थी सक्षम व समर्थ लोकपाल, जिसे सरकार अक्षम व असमर्थ बनाने की कोशिश में लगी है। बाबा रामदेव विदेशी बैंकों में भारतीयों के जमा कालेधन को भी भारत लाकर राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करवाना चाहते हैं। यदि यह धन एक बार देश में आ जाता है तो देश की समृध्दि और विकास का पर्याय तो बनेगा ही, आगे से लोग देश के धन को विदेशी बैंकों में जमा करना बंद कर देंगे। हालांकि कालाधन वापसी का मामला दोहरे कराधान से जुड़ा होने के कारण पेचीदा जरूर है, लेकिन ऐसा नहीं है कि सरकार मजबूत इच्छा शक्ति जताए और धन वापसी का सिलसिला शुरू हो ही न ? बाबा की दूसरी बड़ी मांग हजार और पांच सौ के नोटों को बंद करने की है। ये नोट बंद हो जाते हैं तो निश्चित ही ‘ब्लेक मनी’ को सुरक्षित व गोपनीय बनाए रखने और काले कारोबार को अंजाम देने के नजरिये से जो आदान-प्रदान की सुविधा बनी हुई, उस पर असर पड़ेगा। नतीजतन काले कारोबार में कमी आएगी। सरकार यदि काले धंधों पर अंकुश लगाने की थोड़ी बहुत भी इच्छाशक्ति रख रही होती तो वह एक हजार के नोट तो तत्काल बंद करके यह संदेश दे सकती थी कि उसमें भ्रष्टाचार पर रोकथाम लगाने का जज्बा पैदा हो रहा है।

बाबा रामदेव ‘लोक सेवा प्रदाय गारंटी विधेयक’ बनाने की मांग भी कर रहे हैं। जिससे सरकारी अमला तय समय सीमा में मामले निपटाने के लिए बाध्यकारी हो। समझ नहीं आता कि इस कानून को लागू करने में क्या दिक्कत है। बिहार और मध्यप्रदेश की सरकारें इस कानून को लागू भी कर चुकी हैं। मध्यप्रदेश में तो नहीं, बिहार में इसके अच्छे नतीजे देखने में आने लगे हैं। इस कानून को यदि कारगर हथियार के रूप में पेश किया जाता है तो जनता को राहत देने वाला यह एक श्रेष्ठ कानून साबित होगा। ऐसे कानून को विधेयक के रूप में सामने लाने में सरकार को विरोधाभासी हालातें का भी सामना कमोबेश नहीं करना पड़ेगा। प्रशासन को जवाबदेह बनाना किसी भी सरकार का नैतिक दायित्व है। 
बाबा की महत्वपूर्ण मांग अंग्रेजी की अनिवार्यता भी खत्म करना है। इसमें कोई दो राय नहीं अंग्रेजी ने असमानता बढ़ाने का काम तो पिछले 63 सालों में किया ही है, अब वह अपारदर्शिता का पर्याय बनकर मंत्री और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने का भी सबब बन रही है। बीते एक-डेढ़ साल में भ्रष्टाचार के जितने बड़े मुद्दे सामने आए हैं, उन्हें अंग्रेजीदां लोगों ने ही अंजाम दिया है। पर्यावरण संबंधी मामलों में अंग्रेजी एक बड़ी बाधा के रूप में सामने आ रही है। जैतापुर परमाणु बिजली परिर्याजना के बाबत 1200 पृष्ठ की जो रिपोर्ट है, वह अंग्रेजी में है और सरकार कहती है कि हमने इस परियोजना से प्रभावित होने वाले लोगों को शर्तों और विधानों से अवगत करा दिया है। अब कम पढ़े-लिखे ग्रामीण इस रिपोर्ट को तब न बांच पाते जब यह मराठी, कोंकणी अथवा हिन्दी में होती ? लेकिन फिर स्थानीय लोग इस परियोजना की हकीकत से वाकिफ न हो जाते ? बहरहाल रामदेव के सत्याग्रही अनुष्ठान की मांगे उचित होने के साथ जन सरकारों से जुड़ी हैं। इस अनुष्ठान की निष्ठा खटाई में न पड़े इसलिए इन मांगों की पूर्ति के लिए सरकार समझौते के लिए सामने आती है तो उन्हें समय व चरणबध्द शर्तों के आधार पर माना जाए।
अंत में दो बाते ......
पहली बात बाबा के सत्याग्रह पर आपत्ति करने वालो से .... वैसे तो शायद ही कोई देशभक्त हो जो बाबा के मांगो से सहमत ना हो, फिर भी कुछ मांगो पे बहस हो सकती है जैसे भ्रष्टाचारियो को मृत्युदंड (फांसी) कि सजा देना,हा ये सच है कि दुनिया भर में फांसी कि सजा का विरोध करने वाले लोग बढ़ रहे है ऐसे में कठोर सजा और लूटे गए धन कि अधिकतम वसूली इसका विकल्प हो सकता है और इसपर सहमती बनाई जा सकती है। बड़े नोटों के बंद करने के मामले में कम से कम १००० के नोट तत्काल बंद किया जा सकता है। लेकिन कुछ लोग (खासकर भ्रष्ट और बेईमान लोग) बेवजह भी आपत्ति कर रहे है , और ऐसे लोग बाबा को अपना काम करना चाहिए जैसे फार्मूले भी सुझा रहे है । कुटिल दिग्विजय सिंह का तो पहले ही एक ब्लोगीय कोर्टमार्शल कर चूका हु अब एक नया नाम बडबोले शाहरुख़ खान का आया है।जी हा वही जनाब शाहरुख़ खान जो परदे पे दुसरो का चरित्र निभाते निभाते अब अपने वास्तविक जीवन में भी बहुरुपिया हो गये है , किसी भी मामले में अपनी टांग अड़ाने में माहिर है , चाहे IPL में पाकिस्तानी खिलाडियों के ना खिलाने का मामला रहा हो या दिग्गज कलाकारों से द्वेष करना हो, खुद को किंग खान मान लेना हो या पूर्व कप्तान गावस्कर , सौरव गांगुली का अपमान करने कि कोशिश, मौका नहीं छोड़ते। खुद नाचते गाते क्रिकेट में घुसना हो (धंधे के लिए) और दुसरो को अपने काम करे का नसीहत देते है। खुद राहुल बाबा की चापुलुसी करने वाला बाबा रामदेव को कैसे जान सकता है,कोलकाता की टीम शेयर में काले धन का जम कर इस्तेमाल हुआ है वक्त आने पे सब पता चल जायेगा।ऐसे लोगो के लिए बाबा का ये कथन ही काफी है
"कुछ लोग पूछते है कि आप तो योगी हैं, आपको भ्रष्टाचार से क्या सरोकार। मैं बताना चाहता हूं कि यह योग का विस्तार है। चोरी नहीं करना योग है, सच बोलना योग है, अच्छा आचरण योग है"
दूसरी बात बाबा के समर्थन करने वालो से ....हम सभी समर्थको को इस बात का ध्यान रखना चाहिए की जब हम अपने घर, पड़ोस, दफ्तर में भ्रष्टाचारी को बर्दाश्त करना बंद करेंगे और मौके पर न्याय करना शुरू करेंगे तब एक-एक कर भ्रष्टाचारी कम होंगे। जब देश का हर नागरिक आसपास किसी को रिश्वत लेते या देते देखते ही प्रतिक्रिया करना शुरू करेगा और बाकी लोग तुरंत उसके साथ खड़े होंगे, तब इस कैंसर के विरुद्ध असली क्रांति शुरू होगी। वन्देमातरम ! सत्यमेव जयते !

आप सभी के विचार आमंत्रित है - अजय कुमार दूबे

Monday, 23 May 2011

अब 'आतंक ! बिन लादेन' - ओसामा मरा है, आतंकवाद नहीं

ओसामा बिन लादेन की मौत को आप क्या मानते हैं? जानलेवा आतंकी लड़ाई का अंत? नई जंग की शुरुआत? या, एक अनिवार्य मध्यान्तर? इंटरवल मानना ज्यादा समझदारी होगी। वजह? लादेन आतंकवाद का सबसे बड़ा चेहरा भले ही बन गया हो, पर उसका पर्याय नहीं था। उसके पहले भी आहत भावनाओं से उपजी दहशतगर्दी होती थी। आगे नहीं होगी, इसकी कोई गारंटी नहीं। आप याद कर सकते हैं। इजरायल के लिए यासर अराफात लंबे समय तक आतंकवादी थे, पर दुनिया के तमाम मुल्कों में अपने आदर्शो के लिए लड़ने वाले जंगजू। संभ्रांत लोग अपने बच्चों के नाम यासिर रखकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते थे। दस बरस पहले कुछ देशों में ओसामा नाम रखने की लहर भी चली थी।

निजी तौर पर मैं अराफात और ओसामा को कभी एक पलड़े में नहीं रख सकता, पर यही ओसामा कभी अमेरिकी मीडिया का हीरो हुआ करता था। जब अमेरिकियों को अपना दामन जलता नजर आया, तो वे उसे हीरो से विलेन बनाने में जुट गए, पर वह लगातार ताकतवर होता गया। याद करें। 1993 में रमजी यूसुफ विस्फोटकों से भरा ट्रक लेकर न्यूयॉर्क के विश्व व्यापार केंद्र से जा टकराया था। तब तक अमेरिकियों को गुमान न था कि उनकी कुटिल योजनाओं से पनपा दानव भस्मासुर हो चला है। वाशिंगटन अपनी गलतियों को देखकर देर तक अनदेखा करता है। उसका यह गुरूर लादेन और उसके खूंख्वार अनुयायियों की मदद कर रहा था।

दिक्कत यहीं से खड़ी होनी शुरू हुई। हुक्मरानों की एक दुनिया ऐसी भी थी, जो अमेरिका से जलती थी और ओसामा से डरती थी। इसका फायदा उठाकर अल कायदा खुद को एक सुव्यवस्थित साम्राज्य के तौर पर विकसित कर रहा था। विश्व के नक्शे पर उसके टारगेट साफ थे। पूरी दुनिया से इस्लामी लड़ाके रंग, वर्ण और भाषाई भेद भुलाकर उसके सदस्य बन रहे थे। 2005 में दुनिया की गुप्तचर संस्थाएं एक तथ्य के खुलासे से सकते में आ गई थीं। वह था, एक दस्तावेज -‘अल कायदा की दृष्टि 2020।’

इसमें अमेरिका को उलझाने के लिए पांच लक्ष्य निर्धारित किए गए थे। पहला, उसे किसी मुस्लिम देश पर आक्रमण के लिए उकसाओ। दूसरा, स्थानीय लोगों को उनकी सेनाओं से लड़ने के लिए प्रेरित करो। तीसरा, इस संघर्ष को पड़ोसी देशों तक ले जाओ, ताकि अमेरिकी फौजें लंबे समय के लिए वहां फंस जाएं। चौथा, अल कायदा के आदर्शों (?) को उसके दोस्त देशों में मौजूद व्यवस्था विरोधियों को मित्र बनाने में इस्तेमाल करो। इससे वहां संघर्ष की शुरुआत होगी और उन देशों से अमेरिकी रिश्ते खराब होने लगेंगे। पांचवां, अमेरिका को इतने युद्धों में फंसा दो कि उसकी अर्थव्यवस्था चरामरा उठे।

तमाम तर्कों, वितर्कों और कुतर्कों के साए में उभरता एक सच यह भी था कि अल कायदा काफी कुछ सफल होता दिख रहा था। इराक और अफगानिस्तान में अमेरिका उलझ चुका था। 1929 के बाद की सबसे भयावह मंदी उसके दरवाजे पर दस्तक दे रही थी। 2004 में मैड्रिड की ट्रेन में हुए विस्फोट ने उसी हफ्ते होने वाले चुनाव में उसकी पिट्ठू सरकार को उखाड़ फेंका था। समूची दुनिया वाशिंगटन डीसी की ओर सवालिया नजरों से देख रही थी। अपनी दूसरी पारी के आखिरी दौर में पहुंच रहे जॉर्ज बुश की लोकप्रियता हवा हो चुकी थी। वह अल कायदा का चरमोत्कर्ष था। उस समय उसके पास 40 देशों में हजारों से ज्यादा लड़ाके मौजूद थे। ओसामा का नाम सत्तानायकों की रीढ़ की हड्डी में झुरझुरी पैदा करने लगा था।

इधर, हर रोज ऊंचाइयां तय करता हुआ लादेन भूल गया कि चरम से ही पतन की शुरुआत होती है। 11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क पर हमले के दौरान उसने भले ही तीन हजार लोगों को मारकर सारे संसार को दहशत में डाल दिया हो, पर यह भी सच है कि उसके प्रति नफरत पनपती जा रही थी। सबसे पहले पश्चिमी देश एक हुए, फिर उन्होंने समूचे संसार को अपने से जोड़ना शुरू किया। आम सहमति उभरने लगी कि कुछ भी कीजिए, पर आतंकवाद के इस अंतरराष्ट्रीय दानव को और कद्दावर होने से रोकिए।

अल कायदा मूलत: खुद को दो भागों में बांटकर अपना कारोबार चलाता था। पहला था- लड़ाकू दस्ता, जो प्रशिक्षण, हथियारों के जुगाड़ और हमलों की योजना बनाता था। दूसरा था- वित्त और व्यापार समिति। यह हवाला के जरिये अनधिकृत बैंकों में कभी भी करोड़ों डॉलर जमा करा सकती थी, निकाल सकती थी। सिर्फ मुस्लिम देशों से ही नहीं, बल्कि अमेरिका और यूरोप में कई संगठन उसके लिए धन जुटाने में जुटे हुए थे। 9/11 के बाद अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ योजनाबद्ध तरीके से अल कायदा और उसके हमराहों पर करारे वार करने शुरू किए। आतंक से थर्राती दुनिया ने उसे सहयोग दिया। उधर, व्हाइट हाउस में बराक ओबामा की आमद ने मुस्लिम देशों के अमनपसंद लोगों को राहत की सांस दी। ओसामा ‘जेहाद’ से कम, अमेरिकी विरोध से ज्यादा पनपा था। ओबामा इसे समझते थे। उन्होंने हुकूमत में आते ही मिस्र की यात्रा कर मुअज्जिज लोगों को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में शरीक होने की दावत दी।

दुनिया के तमाम देश इस अभियान में साथ थे ही। उनका कारवां बढ़ने लगा और अल कायदा सिमटने लगा। 2006 में जहां उसके पास हजारों योद्धा थे, वहीं 2009 में इनकी संख्या घटकर 700-800 तक सीमित रह गई। खुद ओसामा छिपा-छिपा घूम रहा था। उसके धन के स्रोत सूख रहे थे। धमकियों के बावजूद उसके लोग अमेरिका, इंग्लैंड या इजरायल पर कोई बड़ा हमला करने में नाकाम रहे थे। इसीलिए जब अमेरिकियों ने पिछले दिनों उसे घेरकर मारा, तो फौरी तौर पर किसी बड़े प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा।

यहां एक सवाल सिर उठाता है। उस समय उसके साथ उसका कोई बड़ा कमांडर क्यों नहीं था? वह अकेला क्यों था? यही वह मुद्दा है, जो आशंका पैदा करता है। ओसामा की ‘शूरा’ के महत्वपूर्ण सदस्य जिंदा हैं। यकीनन, किसी रणनीति के तहत वे अलग-अलग रहते रहे होंगे, ताकि किसी एक या कुछ लोगों के मारे जाने के बाद भी जंग जारी रहे। लादेन जानता था। एक न एक दिन उसे मरना है। उसने अपने मरने के बाद इस लड़ाई को नया मुकाम देने के मोहरे और जरिये जरूर चुने होंगे। अल कायदा जल्दी से जल्दी जताना चाहता है कि उसका नेता मरा है, संगठन नहीं। धमकियां दी जा रही हैं। पाक में तो धमाके होने भी शुरू हो गए है , पाकिस्तान के ८० जवानों की मौत और फिर अरब और अमेरिकी दूतावास के वाहनों पे हमले उसी की कड़ी है। नेटो के टैंकर पे हमला , और कल ही कराची में नौसेना के पीएनएस मेहरान एयरबेस पे हुआ आतंकी कोहराम जो आज दोपहर तक चला .......आगे क्या होगा ??
 
कुछ सुखद उम्मीदें भी हैं। अल कायदा बिखर सकता है, अन्य गुट उस पर हावी हो सकते हैं और लादेन के बाद उसके कद का कोई आतंकवादी नहीं बचा। अबू निदाल के बाद लंबे समय तक शून्य रहा था। ओसामा ने मॉडर्न तरीके से उसे भरा और बढ़ाया था। यदि इसे ट्रेंड मान लें, तो रह बचे आतंकियों पर काबू पाने के बाद कुछ दिन चैन की उम्मीद की जा सकती है। पर यह आतंकवाद का मध्यांतर है, समापन नहीं।

दुनिया में ऐसे हालात अभी मौजूद हैं, जो लाखों लोगों के मन में नफरत पैदा करते हैं। हुक्मरानों को अब उन समस्याओं के तत्काल समाधान पर जोर देना होगा, जो लादेन जैसे लोगों को बनाती हैं। इनके हल होने तक हम खतरे में ही बने रहेंगे। यह सावधानी का वक्त है। भूलिए मत। हम हिन्दुस्तानी इस मामले में इजरायली, इंग्लिश अथवा अमेरिकियों के मुकाबले अधिक दुर्भाग्यशाली साबित होते रहे हैं।

आप क्या कहते है ?? आपके विचार आमंत्रित है - अजय

Wednesday, 20 April 2011

अन्ना भाऊ सजगता और दृढ़ता से लड़ना ..... ..... वरना आप से भी जबाब मांगेगी जनता !!

"अगर अन्ना ने लंबी लड़ाई का मन बना लिया है, तो उन्हें विनोबा की तरह देश के कोने-कोने में अलख जगाने के लिए निकलना होगा। उन्हें जयप्रकाश नारायण की तरह युवकों के खून में उबाल लाना होगा। साथ ही युवा शक्ति को सिर्फ उद्वेलित कर देना पर्याप्त नहीं है, उसे तार्किक परिणति तक भी ले जाना होगा।"

मित्रो जन लोकपाल की स्थापना को भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन की जीत मानना भोलापन होगा। सवा अरब की जनसंख्या वाला यह देश इस किस्म का भोलापन दिखाने का जोखिम मोल नहीं ले सकता। अन्ना ने आंदोलन के अगले चरण की घोषणा भी कर दी है, जो चुनाव सुधारों पर आधारित होगा। छह महीने के भीतर जन लोकपाल विधेयक संसद में पास हो जाए और इस संस्था की स्थापना हो जाए, क्या इतना भर काफी है? जन लोकपाल विधेयक का परिणाम यह होना चाहिए कि सर्वोच्च स्तर पर की जाने वाली स्पष्ट कार्रवाइयों का प्रभाव निचले स्तर तक जाए। इस बात पर ध्यान रखे जाने की जरूरत है कि एक बहुत बड़े मसले को छोटे स्तर पर तो नहीं देखा जा रहा। जोखिम यह भी है कि कहीं जन लोकपाल की स्थापना के बाद देश में यह संदेश न जाए कि अब भ्रष्टाचार का मामला तो हल हो चुका है। सरकार ने तो हथियार डालकर गांधीवादी तरीके से चुनौती का सामना कर लिया है। अब चुनौती अन्ना और उनके साथियों (अर्थात हम सभी ) के सामने है। 
प्रभावी जन लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार होना और जन लोकपाल का निष्पक्ष, निर्भय, परिणामोन्मुख,  और असरदार होना जरूरी होगा। छह दशक में भ्रष्टाचार ने खुद को हमारे भीतर जितनी गहराई तक समा दिया है, उसका उन्मूलन करने के लिए दशक भी कम पड़ेगा। जब तक आम आदमी भ्रष्टाचार के विरुद्ध नारे लगाने तक सीमित रहेगा, यह समस्या दूर नहीं होने वाली। जब वह भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध प्रो-एक्टिव होना शुरू करेगा, तब थोड़ी उम्मीद जगेगी। 

जब हम अपने घर, पड़ोस, दफ्तर में भ्रष्टाचारी को बर्दाश्त करना बंद करेंगे और मौके पर न्याय करना शुरू करेंगे तब एक-एक कर भ्रष्टाचारी कम होंगे। जब देश का हर नागरिक आसपास किसी को रिश्वत लेते या देते देखते ही प्रतिक्रिया करना शुरू करेगा और बाकी लोग तुरंत उसके साथ खड़े होंगे, तब इस कैंसर के विरुद्ध असली क्रांति शुरू होगी। व्यवस्थाओं और प्रावधानों के भरोसे आनन-फानन में भ्रष्टाचार का समूल नाश करने की खुशफहमी छोड़ देनी चाहिए। अन्ना जैसे लोग देश में वह माहौल लाने की पहल कर सकते हैं, लेकिन यह कोई छोटी या समयबद्ध प्रक्रिया सिद्ध नहीं होने जा रही। यह अपने ही खिलाफ लड़ी जाने वाली एक कठिन और लंबी लड़ाई है, जिसे जीतने के लिए एक समग्र सामाजिक क्रांति की जरूरत है। अन्ना और दूसरे लोगों को फिलहाल बैठने या चुनाव सुधारों पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत नहीं है। उन्हें पहले भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को उसकी परिणति तक पहुंचाना होगा। यूं तो देश में मुद्दों की कोई कमी नहीं है, लेकिन अगर एक बड़ी जंग शुरू की गई है, तो पहले उसे पूरा करना जरूरी है। अगर अन्ना ने लंबी लड़ाई का मन बना लिया है, तो उन्हें विनोबा की तरह देश के कोने-कोने में अलख जगाने के लिए निकलना होगा। उन्हें जयप्रकाश नारायण की तरह युवकों के खून में उबाल लाना होगा। युवा शक्ति को सिर्फ उद्वेलित कर देना पर्याप्त नहीं है, उसे तार्किक परिणति तक भी ले जाना होगा।
लोग मांगें समाधान ................... 
 
अचानक उम्मीदों से लबरेज यह देश, अन्ना और उनके साथियों से समाधान मांग रहा है। उनके पास भ्रष्टाचार की व्यापक समस्या के समाधान का विस्तृत, व्यावहारिक ब्लू-प्रिंट होना चाहिए। एक राष्ट्रव्यापी ब्लू-प्रिंट। लड़ाई जितने बड़े स्तर पर लड़ी जानी है, उसकी तैयारी भी उतने ही बड़े स्तर पर करने की जरूरत है। वह तैयारी सैद्धांतिक, राजनैतिक और व्यावहारिक स्तर पर भी होनी चाहिए। इसके लिए बहुत-सी चीजें राजनेताओं से भी सीखने की भी जरूरत है। इतनी बड़ी जीत मिली है, तो इसके सभी परिणाम सकारात्मक नहीं होने वाले। अन्ना को नकारात्मक पहलुओं का सामना करने के लिए भी तैयार रहना होगा। यहीं पर राजनेता हम जैसे आम लोगों पर भारी पड़ जाते हैं। वे आसानी से प्रतिक्रि या नहीं करते, जबकि अन्ना तुरंत प्रतिक्रियाएं करके विरोधी शक्तियों को दुष्प्रचार का मौका दे रहे हैं। मौजूदा जीत में संयम बनाए रखना बहुत जरूरी है। अति-उत्साह और उग्रता, स्थिति को जटिल ही बनाएगी। आंदोलन समाप्त होने के बाद लगभग रोज ही किसी न किसी बयान से अन्ना लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। उन्होंने राजनेताओं पर हमला किया है जिसका जवाब कांग्रेस और भाजपा दोनों ने एकजुटता के साथ दिया। छह दशकों पुराने इस लोकतंत्र में राजनीति एक सच्चाई है। 

अगर सुधारों की कोई भी प्रक्रिया सफल होनी है, तो वह राजनीति तथा राजनेताओं को पूरी तरह अलग करते हुए नहीं बल्कि उन्हें साथ लेकर ही संभव हो सकता है। खैर अब तो समिति भी गठित हो गया है और कई राजनैतिक दलों ने समिति के गठन के तौर-तरीके और उसके स्वरूप पर सवाल उठाने भी शुरू कर दिए हैं। ऐसे में बहुत ही सजगता और दृढ़ता से आगे बढ़ना होगा 

आप क्या सोचते है ? जरूर बताइए - अजय दूबे