मै जब छोटा था तो अली बाबा और चालीस चोर की कहानी पहली बार अपनी अम्मा से सुना था । इस साल के शुरू में ही पहले उत्तरी अफ़्रीका के एक देश ट्यूनिशिया में राजकीय तख़्ता पलट फिर मिस्र में तेज होती क्रांति और अब लपेटे में आते अन्य अरब मुस्लिम देश जैसे अल्जीरिया, जोर्डन और अब यमन में भी क्रांति शुरू हो गयी है। ऐसे में मुझे बचपन की सुनी उसी मजेदार कहानी का शीर्षक "अली बाबा चालीस चोर " अचानक से याद आने लगा है। ट्यूनिशिया में जो बड़े बड़े प्रदर्शन हुए जिन के फलस्वरूप सत्ता परिवर्तन हुआ और राष्ट्रपति ज़िन अल अबिदीन बेन अली देश को छोड़ कर भाग गए। हम कह सकते है अली बाबा (बेन अली) तो गए क्या अब अरब जगत के चालीस चोरों की बारी है......??अब चालीस चोरों की बारी है ...अली बाबा तो गए
अली बाबा तो गए ट्यूनीशिया से लेकर मिस्र तक परिवर्तन की नई लहर ने लोगों में नई उम्मीदें जगा दी हैं। हालांकि अभी यह कहना गलत होगा कि यह क्रांति अरब जगत को कहां ले जाएगी??अरब जगत में परिवर्तन की लहर के आगे दमनकारी सत्ताएं लड़खड़ाने लगी हैं। क्रांन्ति तेजी से फैल रही है। ट्यूनीशिया से शुरू हुई यह क्रांति अब मध्य-पूर्व के ह्रदय मिस्र तक पहुंच गई है।मिस्र एक कमल क्रांति से गुजर रहा है। वैसे तो पूरा अरब जगत उबल रहा है, लेकिन ट्यूनीशिया से लेकर अल्जीरिया, यमन, जोर्डन और मिस्र में लोगों का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा है। ऐसा लगता है कि ट्यूनीशियाई राष्ट्रपति बेन अली के बाद अब मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक के तख्त और ताज को उछाले जाने की बारी आ गई है।पूरे मिस्र में जिस तरह से लोग मुबारक सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं, उसे देखते हुए यह साफ हो गया है कि मुबारक अब कुछ दिनों के ही मेहमान हैं।पिछले कुछ दिनों से राजधानी काहिरा में विद्रोह की स्थिति है जो दिन पर दिन और ताकतवर होता जा रहा है। कफ्र्यू और सैनिक टैंकों की मौजूदगी के बावजूद हजारों-लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। वे राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। ऐसे ही प्रदर्शनों की खबरें पूरे देश से आ रही है।पिछले तीस साल से मिस्र की सत्ता पर कब्जा किए बैठे मुबारक के पास अब विकल्प नहीं रह गए हैं। किसी भी अन्य तानाशाह की तरह मुबारक भी लोगों पर गोलियां चलवा सकते हैं, सेना को उतारकर नरसंहार करवा सकते हैं, लेकिन शुक्रवार के प्रदर्शनों से साफ हो गया है कि लोगों में अब दमन का डर खत्म हो गया है। वे हर कुरबानी देने के लिए तैयार हैं।कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे हालात में सेना और पुलिस के पास भी कोई खास विकल्प नहीं रह जाते है। जब आम लोग सड़कों पर उतर आते हैं, तो दमनकारी सत्ताओं का दमन भी जवाब देने लगता है। ट्यूनीशिया में यही हुआ, जब लोग सड़कों पर उतर आए और उन्होंने पीछे हटने से इंकार कर दिया, तो सेना ने भी उनपर गोलियां चलाने से मना कर दिया। नतीजा बेन अली को देश छोड़कर भागना पड़ा।इस घटना ने सोए हुए अरब जगत, खास कर मिस्र को जगा दिया है। मिस्र में लोगों खास तौर पर, नौजवानों को यह महसूस हुआ कि जब छोटे से देश ट्यूनीशिया के लोग बेन अली के पुलिस राज को चुनौती दे, सकते हैं तो वे क्यों नहीं?कहते हैं कि मिस्र के लोगों में बहुत सब्र है। पिछले तीस साल से वे मुबारक को झेल रहे हैं, लेकिन सहने की भी एक सीमा होती है।
दोहराने की जरूरत नहीं है कि मुबारक के नेतृत्व में मिस्र राजनीतिक रूप से अमेरिकी कठपुतली बन गया है। लोकतंत्र के नाम पर सिर्फ चुनाव का धोखा है। न बोलने की आज़ादी है और न अपने हकों के लिए गोलबंद होने की। एक तरह का पुलिस राज है जहां विरोध का मतलब जेल, पुलिसिया उत्पीड़न और मौत है। ऊपर से बेरोजगारी और महंगाई आसमान छू रही है। नौजवानों के सामने कोई भविष्य नहीं है। लेकिन जब से लोगों को पता चला है कि मुबारक अपने बेटे गमाल को राष्ट्रपति बनाने की तैयारी कर रहे हैं, उनका धैर्य जवाब दे गया है। खासकर नौजवानों का गुस्सा फूट पड़ा है। ऐसा लगता है कि सैनिक और पुलिस ताकत के बल पर जबरन लोगों का मुंह बंद रखने और हर तरह के विरोध को कुचल देने वाली मुबारक हुकूमत ने मिस्र में जिस तरह राज कायम रखा था, उसकी सीवन उधड़ने लगी है। कहने की जरुरत नहीं है कि ट्यूनीशिया से लेकर मिस्र तक परिवर्तन की इस नई लहर ने लोगों में नई उम्मीदें जगा दी हैं। हालांकि अभी यह कहना थोड़ी जल्दी होगी कि यह क्रांति अरब जगत को कहां ले जायेगी? लेकिन इतना तय है कि अरब जगत में लोग परिवर्तन चाहते हैं। आइये, इसका स्वागत करें।
आप क्या सोचते है ?? - अजय दूबे

